बोतल नहीं हमें तो है मतलब शराब से
ख़ुशबू तो आती एक ही है हर गुलाब से
क्या दम तेरा भी घुटने लगा है समाज में
घूँघट यही तो अब भी है पूछे हिजाब से
हिंदू है कौन और मुसलमान कौन है
झेलम भी पूछती ही रही फिर चनाब से
आती नहीं है नींद मुझे अब भी रातों में
नाशाद इतनी आँखें हैं अब उस के ख़्वाब से
उलझी रही सवाल में ख़ुद ग़र्ज़ वो सनम
मतलब उसे था क्या ही हमारे जवाब से
जीना है सीखा हम ने निगाहों से तेरी जान
आँखें ये कम नहीं हैं किसी भी किताब से
रूठी है ऐसे वो भी किसी बात पे अनुज
रूठी हो जैसे रात मेरी माहताब से
— Anuj Vats















