Akram Naqqash

Top 10 of Akram Naqqash

    मैं नहीं हूँ नहीं कहीं भी नहीं
    अब कोई आसमान है न ज़मीं

    एक दुनिया हुई है ज़ेर-ए-नगीं
    शह-नशीं हो गया है ख़ाक-नशीं

    ये सुकूँ भी हुआ मलाल के साथ
    वो बहर-तौर जी रहा है यहीं

    बार-हा तू ने ख़्वाब दिखलाए
    बार-हा हम ने कर लिया है यक़ीं

    एक वीराना था बसा न कभी
    बस्तियाँ हम से गो हज़ार बसीं

    जैसे पानी पे नक़्श हो कोई
    रौनक़ें सब अदम-सबात रहीं

    ग़ुर्फ़ा-ए-दर्द किस ने खोल दिया
    तू तो अब मेरे आस-पास नहीं
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    ब-रंग-ए-ख़्वाब मैं बिखरा रहूँगा
    तिरे इनकार जब चुनता रहूँगा

    कभी सोचा नहीं था मैं तिरे बिन
    यूँ ज़ेर-ए-आसमाँ तन्हा रहूँगा

    तू कोई अक्स मुझ में ढूँडना मत
    मैं शीशा हूँ फ़क़त शीशा रहूँगा

    ताअफ़्फ़ुन-ज़ार होती महफ़िलों में
    ख़याल-ए-यार से महका रहूँगा

    जि
    यूँगा मैं तिरी साँसों में जब तक
    ख़ुद अपनी साँस में ज़िंदा रहूँगा

    गली बाज़ार बढ़ती वहशतों को
    मैं तेरे नाम ही लिखता रहूँगा
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    अब्र-ए-इल्तिफ़ात तिरा ए'तिबार फिर
    आँखों में फिर वो प्यास वही इंतिज़ार फिर

    रख्खूँ कहाँ पे पाँव बढ़ाऊँ किधर क़दम
    रख़्श-ए-ख़याल आज है बे-इख़्तियार फिर

    दस्त-ए-जुनूँ-ओ-पंजा-ए-वहशत चिहार-सम्त
    बे-बर्ग-ओ-बार होने लगी है बहार फिर

    पस्पाइयों ने गाड़ दिए दाँत पुश्त पर
    यूँ दामन-ए-ग़ुरूर हुआ तार तार फिर

    निश्तर तिरी ज़बाँ ही नहीं ख़ामुशी भी है
    कुछ रह-गुज़ार-ए-रब्त हुई ख़ार-ज़ार फिर

    मुझ में कोई सवाल तिरे मा-सिवा नहीं
    मुझ में यही सवाल हुआ एक बार फिर
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    टूटी हुई शबीह की तस्ख़ीर क्या करें
    बुझते हुए ख़याल को ज़ंजीर क्या करें

    अंधा सफ़र है ज़ीस्त किसे छोड़ दे कहाँ
    उलझा हुआ सा ख़्वाब है ता'बीर क्या करें

    सीने में जज़्ब कितने समुंदर हुए मगर
    आँखों पे इख़्तियार की तदबीर क्या करें

    बस ये हुआ कि रास्ता चुप-चाप कट गया
    इतनी सी वारदात की तश्हीर क्या करें

    साअत कोई गुज़ार भी लें जी तो लें कभी
    कुछ और अपने बाब में तहरीर क्या करें
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    कोई इल्ज़ाम मेरे नाम मेरे सर नहीं आया
    वो जो तूफ़ान अंदर था मिरे बाहर नहीं आया

    ये किस की दीद ने आँखों को भर डाला ख़ला से यूँ
    कि फिर आँखों में कोई दूसरा मंज़र नहीं आया

    जुनूँ-बरदार कोई रू-ए-सहरा पर नहीं देखा
    कनार-ए-आबजू प्यासा कोई लश्कर नहीं आया

    हुई बारिश दरख़्तों ने बदन से गर्द सब झाड़ी
    कोई सावन कोई मौसम मिरे अंदर नहीं आया

    कहीं पथरा गई आँखें कहीं शल हौसलों के पाँव
    कहीं रह-रौ नहीं पहुँचा कहीं पर घर नहीं आया

    कभी कश्ती पे कोई बादबाँ मैं ने नहीं रक्खा
    उड़ानों के लिए मेरी कोई शहपर नहीं आया

    नहीं हो कर भी है हर साँस में शामिल मुक़ाबिल भी
    मगर ज़ी-होश कहते हैं कोई जा कर नहीं आया
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    Akram Naqqash
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    हैरत से देखता हुआ चेहरा किया मुझे
    सहरा किया कभी कभी दरिया किया मुझे

    कुछ तो इनायतें हैं मिरे कारसाज़ की
    और कुछ मिरे मिज़ाज ने तन्हा किया मुझे

    पथरा गई है आँख बदन बोलता नहीं
    जाने किस इंतिज़ार ने ऐसा किया मुझे

    तू तो सज़ा के ख़ौफ़ से आज़ाद था मगर
    मेरी निगाह से कोई देखा किया मुझे

    आँखों में रेत फैल गई देखता भी क्या
    सोचों के इख़्तियार ने क्या क्या किया मुझे
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    लहू तेज़ाब करना चाहता है
    बदन इक आग दरिया चाहता है

    मुयस्सर से ज़ियादा चाहता है
    समुंदर जैसे दरिया चाहता है

    इसे भी साँस लेने दे कि हर-दम
    बदन बाहर निकलना चाहता है

    मुझे बिल्कुल ये अंदाज़ा नहीं था
    वो अब रस्ता बदलना चाहता है

    नई ज़ंजीर फैलाए है बाँहें
    कोई आज़ाद होना चाहता है

    रुतें बदलीं नए फल-फूल आए
    मगर दिल सब पुराना चाहता है

    सुकूँ कहिए जिसे है रास्ते में
    दो इक पल ही में आया चाहता है

    हवा भी चाहिए और रौशनी भी
    हर इक हुज्रा दरीचा चाहता है

    बगूलों से भरा है दश्त सारा
    यही तो रोज़ सहरा चाहता है
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    कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ
    दर्द अगर उट्ठे तो क्या शोर मचाने लग जाएँ

    भेद ऐसा कि गिरह जिस की तलब करती है उम्र
    रम्ज़ ऐसा कि समझने में ज़माने लग जाएँ

    आ गया वो तो दिल ओ जान बिछे हैं हर-सू
    और नहीं आए तो क्या ख़ाक उड़ाने लग जाएँ

    तेरी आँखों की क़सम हम को ये मुमकिन ही नहीं
    तू न हो और ये मंज़र भी सुहाने लग जाएँ

    वहशतें इतनी बढ़ा दे कि घरौंदे ढा दें
    सब्ज़ शाख़ों से परिंदों को उड़ाने लग जाएँ

    ऐसा दारू हो रह-ए-इश्क़ से बाज़ आएँ क़दम
    ऐसा चारा हो कि बस होश ठिकाने लग जाएँ
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    तू साथ है मगर कहीं तेरा पता नहीं
    शाख़ों पे दूर तक कोई पत्ता हरा नहीं

    ख़ामोशियाँ भरी हैं फ़ज़ाओं में इन दिनों
    हम ने भी मौसमों से इधर कुछ कहा नहीं

    तू ने ज़बाँ न खोली सुख़न मैं ने चुन लिए
    तू ने वो पढ़ लिया जिसे मैं ने लिखा नहीं

    ये कौन सी जगह है ये बस्ती है कौन सी
    कोई भी इस जहान में तेरे सिवा नहीं

    चलिए बहुत क़रीब से सब देखना हुआ
    अपने गुमाँ से हट के कहीं कुछ हुआ नहीं

    छोड़ा है जाने किस ने मुझे बाल-ओ-पर के साथ
    ये किन बुलंदियों पे जहाँ पर हवा नहीं

    रंग-ए-तलब है कौन सी मंज़िल में क्या कहें
    आँखों में मुद्दआ' नहीं लब पर सदा नहीं

    पीछे तिरे ऐ राहत-ए-जान कुछ न पूछियो
    क्या क्या हुआ नहीं यहाँ क्या कुछ हुआ नहीं
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    खुली और बंद आँखों से उसे तकता रहा मैं भी
    तिरी दुनिया के पीछे भागता फिरता रहा मैं भी

    मिरी आवाज़ पिछली रात तुझ तक कैसे आ पाती
    किसी गहरे कुएँ में रात भर सोता रहा मैं भी

    ब-ज़ाहिर देखती आँखें ब-ज़ाहिर जागती रूहें
    ब-ज़ाहिर इन सभों के साथ ही जीता रहा मैं भी

    मैं हूँ इस कारसाज़-ए-बे-कसाँ की दस्तरस में यूँ
    वो जिस साँचे में भी ढाला किया ढलता रहा मैं भी

    बदन मल्बूस में शो'ला सा इक लर्ज़ां क़रीन-ए-जाँ
    दिल-ए-ख़ाशाक भी शो'ला हुआ जलता रहा मैं भी

    है जिस राह-ए-यक़ीं पर गामज़न पा-ए-ख़िरद हर-दम
    उसी राह-ए-गुमाँ पर मुद्दतों चलता रहा मैं भी
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