सादा-दिल सादा-मिज़ाज-ओ-बा-अमल इंसान था
ख़ूबियों का आइना था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
पासदार-ए-हुर्रियत था आबरू-ए-हिन्द था
एक सच्चा रहनुमा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
उस के हाथों में अमानत थी वतन की ज़िंदगी
इक अमीन-ए-बा-वफ़ा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
उस के हाथों में सलामत था सफ़ीना देश का
या'नी अपना नाख़ुदा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
आसमान-ए-इल्म का था इक दरख़्शाँ आफ़्ताब
चश्मा-ए-नूर-ओ-ज़िया था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
मेहरबानी हर सवाली पर किया करता था वो
बे-बसों का हम-नवा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
रहनुमा-ए-क़ौम हो कर भी गदा-ए-क़ौम था
बेकसों का आसरा था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
शरअ' का पाबंद था लेकिन तअ'स्सुब से बरी
सच तो ये है देवता था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
इक दरख़्शंदा सितारा था हमारे देश का
क्या बताए चर्ख़ क्या था डॉक्टर-ज़ाकिर-हुसैन
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जिस से हर क़ौम की तक़दीर बना करती है
हमें अख़्लाक़ का वो दर्स सिखाता आया
आत्मा साफ़ हुआ करती है जिन जज़्बों से
मशअ'ल-ए-राह उन्हीं जज़्बों को बनाता आया
हम दयानंद को कहते हैं पयम्बर लेकिन
ख़ुद को वो क़ौम का सेवक ही बताता आया
आर्य-वर्त का रौशन-तरीं मीनार था वो
रौशनी सारे ज़माने को दिखाता आया
क़ौम को शुद्धि की ता'लीम का उनवाँ दे कर
क़ौम को ग़ैर के पंजे से छुड़ाता आया
भाई-चारे से मोहब्बत से रवादारी से
क़ौम को जीने का अंदाज़ सिखाता आया
अपनी तहज़ीब जिसे लोग भुला बैठे थे
वेद-मंतर से वही याद दिलाता आया
शास्त्र और वेद के मंतर का उचारन कर के
अहद-ए-माज़ी का इक आईना दिखाता आया
घोर अंधकार था अज्ञान का जारी हर-सू
ज्ञान अज्ञान के अंतर को मिटाता आया
कुफ्र-ओ-बातिल के उड़े हाथों के तोते ऐ 'चर्ख़'
हक़-परस्ती का वो यूँ डंका बजाता आया
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जल्वा-ए-हुस्न से है सूरत-ए-औक़ात नई
दिन नया सुब्ह नई शाम नई रात नई
दिन नया सुब्ह नई शाम नई रात नई
इन बदलते हुए हालात का मातम कैसा
हर नए दौर में बनती हैं रिवायात नई
हर मुलाक़ात का अंदाज़ नया होता है
जो भी होती है वो होती है मुलाक़ात नई
नया-पन हुस्न को विर्से में मिला हो जैसे
हर अदा उस की नई वज़्अ' नई बात नई
चाँद-तारों में नया नूर उमड आता है
'चर्ख़' वो आते हैं आती है नज़र रात नई
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गुनगुनाती हुई आवाज़ कहाँ से लाऊँ
तेरी आवाज़ का अंदाज़ कहाँ से लाऊँ
तेरी आवाज़ का अंदाज़ कहाँ से लाऊँ
तेरे अल्ताफ़ से रक़्साँ हैं लबों पर ख़ुशियाँ
ग़म में डूबी हुई आवाज़ कहाँ से लाऊँ
हाल-ए-दिल फूल से चेहरों को सुनाने के लिए
मैं लब-ए-ज़मज़मा-पर्वाज़ कहाँ से लाऊँ
मुझ से हंस हंस के तिरी मश्क़-ए-सितम होती है
तुझ सा मोनिस बुत-ए-तन्नाज़ कहाँ से लाऊँ
शोमी-ए-बख़्त है ये 'चर्ख़' कि वो कहते हैं
मैं मसीहाई का अंदाज़ कहाँ से लाऊँ
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जो आँसुओं को न चमकाए वो ख़ुशी क्या है
न आए मौत पे ग़ालिब तो ज़िंदगी क्या है
न आए मौत पे ग़ालिब तो ज़िंदगी क्या है
हमें ख़बर है न अपनी न अहल-ए-दुनिया की
कोई बताए ये अंदाज़-ए-बे-ख़ुदी क्या है
मैं साथ देता हूँ यारों का हद्द-ए-मंज़िल तक
मैं जानता नहीं दस्तूर-ए-रह-रवी क्या है
तिरे ख़याल में दिन-रात मस्त रहता हूँ
ये बंदगी जो नहीं है तो बंदगी क्या है
तिरे करम से मुयस्सर है दौलत-ए-कौनैन
तिरा करम है जभी तक मुझे कमी क्या है
नए पुराने नशेमन सभी जला कर अब
निगाह-ए-बर्क़ खड़ी दूर ताकती क्या है
किसी की चश्म-ए-करम आप पर नहीं तो क्यूँ
ये ख़ुद से पूछिए किरदार में कमी क्या है
न आई जागती आँखों के दाएरे में कभी
ये बद-नसीब का इक ख़्वाब है ख़ुशी क्या है
जो बात कहता हूँ करते हैं उस पे हर्फ़-ज़नी
ये दोस्ती है तो अंदाज़-ए-दुश्मनी क्या है
क़दम क़दम पे किए 'चर्ख़' ज़िंदगी ने मज़ाक़
समझ में आ न सका क़स्द-ए-ज़िंदगी क्या है
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तेरे वा'दे तेरी यादें तेरे नग़्में तेरे ख़्वाब
हुस्न से भरपूर दौलत मेरे काशाने में है
साग़र-ओ-मीना में लहराती है हर मौज-ए-शराब
इक जवानी का तलातुम आज मयख़ाने में है
बज़्म-ए-दुनिया में हैं हुस्न-ओ-इश्क़ यूँ जल्वा-नुमा
रौशनी है शम्अ'' में तो सोज़ परवाने में है
मय की इक इक बूँद से तूफ़ान-ए-मस्ती है अयाँ
किस की मय-बार अँखड़ियों का अक्स पैमाने में है
नूर की बारिश अभी होने दे थोड़ी देर और
इक ज़रा सी देर ही तो रात ढल जाने में है
लाख फ़ितरत ने दिखाई बर्क़ की चश्मक-ज़नी
उस में वो शोख़ी कहाँ जो तेरे शरमाने में है
जान भी दिल भी जिगर भी आरज़ू-ए-वस्ल भी
उन के पेश अपना सभी कुछ आज नज़राने में है
मय उभर कर जाम में अंगड़ाइयाँ लेने लगी
कैसा मद्द-ओ-जज़्र साक़ी तेरे मयख़ाने में है
'चर्ख़' मैं ना-आश्ना हूँ हिज्र के माहौल से
वस्ल का रंगीन पहलू मेरे अफ़्साने में है
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बज़्म-ए-जानाँ में मोहब्बत का असर देखेंगे
किस से मिलती है नज़र उन की नज़र देखेंगे
किस से मिलती है नज़र उन की नज़र देखेंगे
अब न पलकों पे टिको टूट के बरसो अश्कों
उन का कहना है कि हम दीदा-ए-तर देखेंगे
धड़कनो तेज़ चलो डूबती नब्ज़ो उभरो
आज वो बुझते चराग़ों की सहर देखेंगे
ऐ मिरे दिल के सुलगते हुए दाग़ो भड़को
हिज्र की रात वो जलता हुआ घर देखेंगे
तेरे दर से हमें ख़ैरात मिले या न मिले
हम तिरे दर के सिवा कोई न दर देखेंगे
मय-कदे झू
मेंगे बरसेगी जवानी की शराब
वो छलकती हुई नज़रों से जिधर देखेंगे
उन की नज़रों से है वाबस्ता ज़माने की नज़र
वो जिधर देखेंगे सब लोग उधर देखेंगे
आज माज़ी के फ़साने वो सुनेंगे ऐ 'चर्ख़'
मेरी बर्बाद उमीदों के खंडर देखेंगे
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बात कहने के लिए बात बनाई न गई
हम से बारात फ़रेबों की सजाई न गई
हम से बारात फ़रेबों की सजाई न गई
आज भी दार के तख़्ते से सदा आती है
हक़ की आवाज़ सितमगर से दबाई न गई
दोस्त करते हैं हसद इस लिए तेरी तस्वीर
मा-सिवा दिल के कहीं और सजाई न गई
ग़म की तस्वीर बनाने को मैं जब भी बैठा
उन की मुस्कान उभर आई बनाई न गई
नई तहज़ीब के ख़ाकों को सँवारा हम ने
हम से अख़्लाक़ की तस्वीर बनाई न गई
जाने क्या सूझी मिरी क़ब्र पर आ कर उन से
गुल चढ़ाए न गए शम्अ'' जलाई न गई
मैं तो बात आई गई कर के चला आया था
हो गई बात पराई वो दबाई न गई
उस ने हंगामों से बहलाई है अपनी दुनिया
वक़्त से अम्न की शहनाई बजाई न गई
'चर्ख़' देखे जो जवानी के उभरते जल्वे
ज़िंदगी अपनी गुनाहों से बचाई न गई
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मय्यत उठाने कोई भी आया न बा'द-ए-मर्ग
सुनते थे ज़िंदगी में मिरी बात सैंकड़ों
तुम थे तो ज़िंदगी का न कोई सवाल था
अब जन्म ले रहे हैं सवालात सैंकड़ों
क्यूँ उस निगाह-ए-मस्त की सब माँगते हैं ख़ैर
आबाद और भी हैं ख़राबात सैंकड़ों
चमके जो तेरे नूर से दिन-रात थे वही
आने को यूँ तो आए हैं दिन-रात सैंकड़ों
पर्दा-नवाज़ हुस्न के क़ुर्बान जाइए
इक इक हिजाब में हैं हिजाबात सैंकड़ों
वो बात कोई भी न कहेगा जो हम कहें
तुम जो कहो कहेंगे वही बात सैंकड़ों
करते हैं अर्ज़-ए-वस्ल पे हाँ-हूँ अजी नहीं
या'नी सवाल इक है जवाबात सैंकड़ों
बनते हैं ज़िंदगी के फ़साने उन्हीं से 'चर्ख़'
वो हैं तो ज़िंदगी की रिवायात सैंकड़ों
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रंग भर कर तिरी तस्वीर में जज़्ब-ए-ग़म का
अपनी तस्वीर बना दी तिरे सौदाई ने
वस्ल-ए-महबूब की तदबीर सुझाई मुझ को
हक़-परस्ती ने अक़ीदत ने जबीं-साई ने
हम ने सोचा था कि बुझ जाएँगे ग़म के शो'ले
आ के कुछ और हवा दी उन्हें पुर्वाई ने
शोरिश-ए-दहर ने बेगाना किया ख़ुद से मुझे
आगही बख़्शी मुझे गोशा-ए-तन्हाई ने
एक मा'सूम से चेहरे पे र'ऊनत की नुमूद
हाए क्या ज़ुल्म किया आलम-ए-बरनाई ने
गर्दिश-ए-वक़्त ने मयख़ाने में दम तोड़ दिया
जाने क्या चीज़ पिला दी तिरे सहबाई ने
रुख़ तमाशे का बदल डाला अचानक आ कर
एक ख़ुश-चेहरा ख़ुश-अंदाज़ तमाशाई ने
चर्ख़ आपस के तअ'ल्लुक़ का ये अंदाज़ भी देख
कर दिया उन को भी रुस्वा मिरी रुस्वाई ने
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