boxes-v1
logo
coin0
  • Search
  • Shayari
  • Writers
  • Events
  • Blog
  • Store
  • Help
  • Login
  • home-v1
  • swipe
  • feather-v4
  • shopping-bag-v1
  • user-v1
cross
preview

By:

00:00/00:00

playButtonWhite
backDheerendra Singh Faiyaz

Top 10 of Dheerendra Singh Faiyaz

Dheerendra Singh Faiyaz

Top 10 of Dheerendra Singh Faiyaz

    तुम अहल-ए-दिल हो सो दिल में रखा हमारा नाम
    वगर्ना हम भी हैं क्या और क्या हमारा नाम

    हर एक शख़्स के सीने में हम धड़कते हैं
    सभी के होंटों पे है जा-ब-जा हमारा नाम

    तमाम उम्र कई लफ़्ज़ चाक पर घू
    में
    तब एक अर्से में जा कर बना हमारा नाम

    तुम्हारे कानों की ढलती हुई गुफाओं में
    ब-रंग-ए-रौशनी पड़ता हुआ हमारा नाम

    सदा कुछ और ही आई थी उस की जानिब से
    हमें लगा था कि उस ने लिया हमारा नाम

    ख़मोशियों के बदन पर सदाएँ लिखनी थीं
    अजीब शख़्स था लिखने लगा हमारा नाम

    फिर उस को सुन के बहुत देर तक सभी रोए
    कोई कहानी थी आख़िर में था हमारा नाम
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    10
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    हम अपने आप को इतना बदल नहीं सकते
    तुम्हारे कहने से चेहरा बदल नहीं सकते

    बदलना चाहें अगर क्या बदल नहीं सकते
    मगर जो हाल है दिल का बदल नहीं सकते

    तुम्हारे वास्ते या'नी बदल चुके हैं बहुत
    अब और ख़ुद को ज़ियादा बदल नहीं सकते

    अजीब लोग हैं दुनिया बदलना चाहते हैं
    मगर वो ख़ुद को ज़रा सा बदल नहीं सकते

    डरे हुए हैं समुंदर मिरी रवानी से
    मगर वो चाह के रस्ता बदल नहीं सकते

    हमारी ज़ात को मुद्दत में ये हुआ है नसीब
    अब अपने जीने का लहजा बदल नहीं सकते

    अलावा दुख के तिरी क़िस्मतों में हम भी हैं
    नसीब तेरा लिहाज़ा बदल नहीं सकते

    वो एक दूजे से आँखें बदलते रहते हैं
    जो लोग रोज़ का रोना बदल नहीं सकते

    बदल रहा है रवय्या ज़रा ज़रा ही सही
    अब एक दिन में तो सारा बदल नहीं सकते
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    9
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    ज़िंदगी तुझ को भी और तेरा तमाशा देखूँ
    अपनी मासूम सी आँखों से मैं क्या क्या देखूँ

    क्या सिवा इस के भला और नज़ारा देखूँ
    रात की शाख़ पे उस चाँद को बैठा देखूँ

    रक़्स करता हुआ गुज़रा है अभी हिज्र का दुख
    धूल छट जाए तो आगे का भी रस्ता देखूँ

    एक वो दिन था कि इक शख़्स था दुनिया मेरी
    एक ये दिन है कि हर शख़्स में दुनिया देखूँ

    मेरी निय्यत तो बहुत बार परख ली उस ने
    मैं भी उस शख़्स का इस बार इरादा देखूँ

    वक़्त के साथ तो ख़ुद वक़्त बदल जाता है
    सो ही ख़्वाहिश है कि मैं ख़ुद को बदलता देखूँ

    और तू बोल पड़े पलकें तो झपकाया करो
    सोचता हूँ तिरी तस्वीर को इतना देखूँ
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    8
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    रख ली माथे पे शिकन उस की निशानी जैसे
    नए घर में हो रखी चीज़ पुरानी जैसे

    ऐसे भूली है मिरी आँख हुनर रोने का
    किसी झरने से बिछड़ जाए रवानी जैसे

    तेरी आँखों से भला कैसे हटाऊँ आँखें
    मुझ पे खुलते ही नहीं इन के मआ'नी जैसे

    आइना कहने लगा कुछ कमी तुझ में भी है
    हम ने भी पूछ धरा उस से कि या'नी जैसे

    वो किसी शे'र में ढल जाए ग़नीमत वर्ना
    उस को तफ़्सील से लिक्खूँगा कहानी जैसे

    हम तिरे हिज्र में सहरा की तरफ़ क्यूँ भागें
    हम ने सीखी ही नहीं ख़ाक उड़ानी जैसे

    मैं ने हर रोज़ तुझे दिल से निकाला तो मगर
    किसी दरिया से निकाले कोई पानी जैसे

    क्या बुरा है कि जो बातिन है वही ज़ाहिर है
    हम को आती ही नहीं बात बनानी जैसे
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    7
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    सोच कर देखिए क्या ख़ूब नज़ारा होगा
    उस ने जब रह के मेरा नाम पुकारा होगा

    हम ने सोचा था कि अब ग़म से किनारा होगा
    पर कहाँ थी ये ख़बर इश्क़ दोबारा होगा

    क्या कहें कब से ये उम्मीद लिए बैठे हैं
    उस की जानिब से कभी कोई इशारा होगा

    तुझ को देखूँ तो कोई और नज़र आता है
    तू ने उस शख़्स को दिन रात गुज़ारा होगा

    शहर में मुझ सा कोई और भी दीवाना है
    हौसला हिज्र में वो शख़्स भी हारा होगा

    किस तरह उस को बसाएँगे ज़रा से दिल में
    सोचते रहते हैं जब कोई हमारा होगा
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    6
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    तुझ को लगता है तो हाँ ठीक है मन-मानी है
    मुझे अब बात समझनी है न समझानी है

    वर्ना वो ख़्वाब कि ता-उम्र न सोए कोई
    नींद आ जाती है इस बात की आसानी है

    सत्ह में इस की सिवा रेत के अब कुछ भी नहीं
    या'नी रोने के लिए आँख में बस पानी है

    तजरबा उस को भी कुछ ख़ास नहीं दुनिया का
    ख़ाक हम ने भी ज़माने की नहीं छानी है

    मेरे चेहरे पे यही देख के बिखरी मुस्कान
    मैं परेशान हूँ और उस को परेशानी है
    इश्क़ में इतनी सुहूलत भी नहीं पाओगे
    जान पर बन पड़ी तो जान चली जानी है

    हम कहाँ रूह की बातों में उलझ जाते हैं
    दरमियाँ अपने तअल्लुक़ भी तो जिस्मानी है
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    5
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    अपनी तन्हाई ज़िंदगी कर ली
    ज़ब्त छलका तो शा'इरी कर ली

    रंग में ढलते हुए तिरे मैं ने
    शक्ल तक अपनी साँवली कर ली

    रात भर आसमान में भटका
    चाँद ने सुब्ह ख़ुद-कुशी कर ली

    जब ज़बाँ वाले बे-वफ़ा निकले
    बे-ज़बानों से दोस्ती कर ली

    तू मिरे हासिलों में है तो नहीं
    फिर भी ख़्वाहिश कभी कभी कर ली

    फिर किया इश्क़ और फिर पूरी
    जो कसर थी रही-सही कर ली

    कुछ ने चुन ली ग़ज़ल की मुश्किल राह
    कुछ ने घबरा के नौकरी कर ली
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    4
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    मिरा यक़ीन है वो आइना निकालेगी
    वो नक़्स मुझ में ही फिर कुछ नया निकालेगी

    मुझे भी कुछ नहीं कहना कि अब ख़मोशी ही
    हमारे बीच कोई रास्ता निकालेगी

    जबीं पे उस की शिकन है न आँख में पानी
    भला वो दिल से हमें और क्या निकालेगी

    मिरी ख़मोशी का मतलब था सिर्फ़ ख़ामोशी
    वो इस में पहलू मगर दूसरा निकालेगी

    ऐ दुनिया बोल मगर कुछ नहीं सुनूँगा मैं
    ज़बाँ से जो भी तू अच्छा बुरा निकालेगी

    हमें न सुध है न हम दस्तकें ही सुनते हैं
    तू अपने दिल से हमें क्या भला निकालेगी

    मैं दूरियों में भी नज़दीकियाँ निकालता हूँ
    वो फ़ासलों में भी कुछ फ़ासला निकालेगी
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    3
    download-v1
    Download Image
    1 Like
    देखते देखते ही साल गुज़र जाता है
    पर तिरा ग़म है कि बढ़ता है ठहर जाता है

    तैरती रहती है आँखों में तू हर शब ऐसे
    जैसे दरिया में कोई चाँद उतर जाता है

    कौन उस ख़्वाब की ता'बीर पे करता है यक़ीं
    ख़्वाब जो नींद से लड़ता हुआ मर जाता है

    हम ने आँखों की ज़बानों पे लगाए हैं क़ुफ़्ल
    वर्ना दिल तेरी ही आवाज़ों से भर जाता है

    कोई हर रोज़ मुझे छोड़ के मर जाता है
    जाने वो कौन है कैसा है किधर जाता है

    एक ही वक़्त में सुख-दुख नहीं मिलते मुझ को
    पाँव गर अपने बचाऊँ तो सफ़र जाता है

    फिर से दुनिया की तरफ़ ध्यान लगाया है मगर
    ख़ाक इतने में तिरा दिल से असर जाता है
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    2
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
    मैं इक झूटी कहानी लिख रहा हूँ
    लिहाज़ा ज़िंदगानी लिख रहा हूँ

    तू झीलों की रुकावट सोचती रह
    मैं दरिया की रवानी लिख रहा हूँ

    सराबों से कहीं बुझती हैं प्यासें
    गुमाँ के मुँह पे पानी लिख रहा हूँ

    बदन का तर्जुमा तो कर दिया है
    अब आँखों के मआ'नी लिख रहा हूँ

    मुझे लिखना था अपने बारे में कुछ
    सो अपनी राएगानी लिख रहा हूँ
    Read Full
    Dheerendra Singh Faiyaz
    Share
    1
    download-v1
    Download Image
    0 Likes
whatsapp Get Shayari on your Whatsapp
Ehsan DanishEhsan DanishAmjad NajmiAmjad NajmiAshu MishraAshu MishraAks samastipuriAks samastipuriWaseem BarelviWaseem BarelviIrfan SiddiqiIrfan SiddiqiAitbar SajidAitbar SajidSubhan AsadSubhan AsadTehzeeb HafiTehzeeb HafiLala Madhav Ram JauharLala Madhav Ram Jauhar