Ekram Khawar

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Ekram Khawar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ekram Khawar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Nazm
बहुत कुछ चाहता था मैं
हमेशा चाहता था मैं
कि दुनिया ख़ूब-सूरत हो
कि जैसी
प्यार करते वक़्त होती है
चाहता था
शाम होते ही उतर आए
फ़लक से चाँद बच्चों की हथेली में
कि शब
तारीक हो जितनी मगर
नम हो खनक हो
और पूरब की हवाएँ
सुबुक रफ़्तार गुज़रें
छतों पर ओस हो
और आँगनों में कहकशाँ उतरे

हमेशा चाहता था मैं
कि आँसू ही नहीं हों
और अगर हों तो
वफ़ूर-ए-सर-कशी के
ज़बाँ में कोई लुक्नत
और होंटों में
कोई लर्ज़िश न हो हरगिज़
अगर हो तो
मोहब्बत की तपिश में

ख़ुदाओं की तरह क़ादिर
हमारे बाप बूढे ही न हों
और अप्सराओं और परियों सी
हसीं महबूब माएँ

अपने बच्चों को न रोएँ
किसी बच्चे की आँखों में
कभी वहशत न दर आए

कोई दुनिया से ना-महरम न गुज़रे

जवाँ होने से पहले सारे बच्चे
भाग जाएँ अपने घर से
और दुनियाएँ बसाएँ
या कोई बच्चा
किसी घर से न भागे
हमारे गाँव की अल्हड़ हसीना की जवानी
इतनी जल्दी तो न गुज़रे
बहुत दिन बहुत दिन और
ठहरे

और जश्न की शब
जब बिसात-ए-रक़्स क़ाएम हो
रौशनी बरदार चेहरे भी
मुनव्वर हों

चाहता था कि जिन्हें होने का कोई हक़ नहीं था
ऐसे सारे लफ़्ज़ बाहर हों
ज़बानों से हमारी
और दुनिया भर के सारे लोग
शाइ'र हों

हमेशा चाहता था
बड़ी मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं
कि जैसे चाहता था
साथ एक लड़की का
सर्द यख़-बस्ता हवाओं में
शरारे भरने वाली
एक लड़की

या कोई मर्तूब मौसम
या कि शबनम में नहाई
सीढ़ियों से चाँद तक भीगी हुई इक रात
शब-ए-सेहरा
मुलाएम गरम-जोशी से बनी दुनिया
हलावत और हिद्दत से बनी दुनिया
सीना-ए-शाइर में इक मग़रूर परचम
एक लड़की
एक दुनिया

बहुत मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं
कि जैसे चाहता था
ज़िंदगी में कोई मौसीक़ी कोई नग़्मा
आशनाई दर्द के मिज़राब से
सर्द ज़िंदगी का कोई
बरजस्ता तराना
एक कमरा और बिस्तर
एक रजाई
मेज़ और कुर्सी
किताबें और दवाएँ
दोस्तों के ख़त
एक खिड़की और थोड़ी छत
थोड़ी मस्ती और बे-ख़ौफ़ी

मैं ये भी चाहता था
और वो भी चाहता था
मैं सब कुछ चाहता था
बहुत मा'मूली चीज़ें चाहता था मैं
बहुत मा'मूली चीज़ों पर टिकी थी ज़िंदगी मेरी
मुझे अफ़्सोस है इस का

मेरी आँखों ने देखा था
जहाँ को
आरिज़-ए-महबूब की सूरत
हमारे ज़ेहन में
हर ख़्वाब की तफ़्सील थी
हर हुस्न का इम्कान था
आसमाँ कुछ भी नहीं
एक खेल का मैदान था
बच्चों की ख़ातिर
और समुंदर महज़ एक काँच की चादर
जिसे लिखने की ख़ातिर
मेज़ पर रखा गया था

वाक़िआ''' तो ये है कि
दुनिया
मिरे कमरे से ज़ियादा
कुछ नहीं थी
मुझे मालूम था
कि फूल किस गोशे में होंगे
क़लम होगा कहाँ पर
किस जगह खेलेंगे बच्चे
और ख़ंजर
किस जगह होगा
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जिन दिनों
मैं अपनी तन्हाई का नौहा लिख रहा था
बस्तियाँ आबाद थीं रौनक़ भरी थी शाम
और जाड़ा गुलाबी
ताज़ा ताज़ा शहर में दाख़िल हुआ था
जिन दिनों मैं
पा-प्यादा और फिर सदा ज़बाँ में
सोज़-हा-ए-अंदरूँ के क़िस्सा-ए-पारीना की तफ़्सील में ता'बीर में
उलझा हुआ था
भेड़िये आज़ाद थे
और एक क़ातिल राग
बजाता जा रहा था
ख़ूब-तर से ख़ूब-तर था
क़त्ल का नग़्मा
जिस ने जो समझा वही तारीख़ थी
ख़्वाजा-सरा-ए-शहर दारुस्सलतनत में
कर्बला के हुज़्न में
एक वहशियाना रक़्स की तख़्लीक़ में मसरफ़ था
और सब तमाशाई सभी मक़्तूल सारे
दम-ब-ख़ुद मबहूत ख़ामोशी से सुनते जा रहे थे
और मौसीक़ी से लग-भग ना-बलद हर शख़्स
अगली सफ़ में बैठा
ताल की हर गत पर हर झंकार पे
बेहाल होता जा रहा था

एक क़ातिल और सुरीला राग
बजाता जा रहा था
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दिल-ए-वहशी जुनूँ की कौन सी मंज़िल थी कल शब
जहाँ बाहम हुए क़ज़्ज़ाक़-दिलबर
चले ख़ंजर गले पर आस्तीं पर
दिल-ओ-दामन पे दस्तार-ओ-जबीं पर
अजब एक शोर था महशर बपा था

बहुत आह-ओ-फ़ुग़ाँ अंदोह जानी
हज़ारों ज़ख़्म और एक सख़्त जानी

न जाने शिद्दत-ए-यलग़ार क्या थी
नहीं मा'लूम क्या मुद्दत रही
किश्त-ए-निगाराँ की
खुली जब आँख तो
एक टूटते नशे का आलम था
शफ़क़-गूँ था उफ़ुक़ दिल का
चमन का रास्ता धब्बों से पुर था
और सबा दामन में अपने ख़ून की बू बास रखती थी
नज़ारा दीदनी था
और दिल-ए-बेताब ने देखा

लहू से लाल है सेहन-ए-चमन और हर तरफ़
बद-रंग ख़ूँ की लाला-कारी है
नगीना दिल का सौ टुकड़े पड़ा है
और हर टुकड़े में कोई अक्स-ए-वहशी है

दिल-ओ-दिलबर की आशुफ़्ता-सरी है
दिल-ओ-दिलबर की राहों में
फ़क़त शीशे की किर्चें हैं
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शर्क़ से ग़र्ब तक
अर्श से फ़र्श तक
या कराँ ता कराँ
एक सन्नाटा फैला हुआ
मेरी बेकल जबीं के तिलिस्मात से
तेरी बेचैन बाँहों के इल्हाम तक
तिश्ना होंटों से हलचल भरे जाम तक
उन की आँखों के रौशन दियों से
मिरी अर्ग़वानी घनी शाम तक

या कराँ ता कराँ
एक सन्नाटा फैला हुआ

कहकशाँ बुझ गई रास्ते में कहीं
रंग-ए-नूर-ए-सहर लुट गया
आसमानों में उलझा हुआ
मै-कदा नूर का
दिलबरान-ए-हरम
थक के गुमनाम रस्तों में गुम हो गए
रंग-ए-महताब कुम्हला गया
मह-रुख़ाँ
चश्म-ए-आहू सिफ़त
मस्त मदमाती शामों में
हसरत की दहलीज़ पर
आह भरते रहे
और सबा रात भर
ज़र्द महताब की आँच में
ख़ाक बर-सर भटकती रही
या कराँ ता कराँ
एक सन्नाटा फैला हुआ

हल्का-ए-आशिक़ाँ से लब-ए-बाम तक
दस्त-ए-साक़ी से दुर्द-ए-तह-ए-जाम तक
दीद-ए-बीना से बिस्मिल के अंजाम तक
मा'बदों की ख़मोशी से हंगामा-ए-मजमा'-ए-आम तक
शहर-ए-अफ़्सोस की तीरा-ओ-तार गलियों से
रौशन दमकती हुई शारा-ए-आम तक
याँ कराँ ता कराँ
एक सन्नाटा फैला हुआ

रब्ब-ए-मा'बूद गुम आसमानों में है
गुंग-ओ-ख़ामोश है
बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा नाएब-अल्लाह-फ़िल-अर्ज़
कौन-ओ-मकाँ
इश्क़ का माजरा
हुस्न का माजरा
दर्द का माजरा
या ख़ुदा
या ख़ुदा
कुछ सबील-ए-जज़ा
दिल धड़कने को कोई बहाना
ख़ुदा
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Ekram Khawar
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बीसवीं सदी के आख़िरी बरसों में
एक गहराती हुई शाम को
जब परिंदों और पत्तों का रंग सियाह हो चुका था
और दुख का रंग हर रंग पर ग़ालिब था
माँ टूट चुकी थी
महबूबा रूठ चुकी थी
हफ़्ता-वार तातील की फ़राग़त से मुतमइन
सरशारी के एक लम्हे को बे-क़रार
शाइ'र
लिखने बैठा
गिर्द-ओ-पेश की दुनिया
निहायत आहिस्तगी से
ख़फ़ीफ़ पर्दों से छनती हुई
ग़ाएब हो गई
और पूरी काएनात महदूद हो कर
मेज़ के रक़्बे में सिमट आई
शाइ'र ना-मालूम कितने ज़मानों तक
महबूत बैठा फ़ज़ा की सरगोशियाँ सुनता रहा
साएँ साएँ करती ख़ामोशी में
मो'तबर अल्फ़ाज़ की तलाश-ओ-जुस्तुजू में
ग़लताँ-व-पेचाँ
कि यक लख़्त रात की शह-रग से
कई ख़ून के फ़व्वारे छूटे
और सिसकती सीढ़ियों चीख़ते दरवाज़ों के आहंग पे
मेज़ पर पड़ी काँच से झाँकती
मार्क्स की तस्वीरों पर
इक-तारा बजाते हुए नेपाली बच्चे की तस्वीर
और पाश की नज़्मों पर
मूसला-धार आँसुओं की बारिश होने लगी
और बाहर रात की तारीकी में कुत्ते भौंकने लगे

नसीबों जली बाँकी तिलँगन रात जारी थी
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दिल बहुत दुखता है हर बात पे दिल दुखता है
सुब्ह-ए-नौ-ख़ेज़ पे सूरज की जहाँबानी पे
शाम-ए-दिल-दोज़ पे अंजाम-ए-गुल-अंदामी पे
अक्स-ए-मौजूद पे
अनवार-ए-रुख़-ए-ज़ेबा पे
नक़्श-ए-मौहूम पे अखफ़-ए-दिल-ए-फ़र्दा पे
बस्त-ए-अफ़्लाक पे अफ़साना-ए-रानाई पे
शरह۔ए-नैरंगी-ए-हस्ती-ओ-ज़ुलेख़ाई पे
रात के सोज़ पे शामों के महक जाने पे
हिद्दत-ए-शौक़ में कलियों के चटख़ जाने पे
मुज़्महिल तारों पे सह
में हुए ऐवानों पे
क़हवा-ख़ानों में जम्अ' शहर के दीवानों पे
रिंद-ए-मख़मूर-ओ-बला-नोश पे परवानों में
शम-ए-कुश्ता पे उजड़े हुए इंसानों पे
आरज़ूओं की सुबुक-सारी पे अर्ज़ानी पे
दिल शफ़क़ रंग पे जज़्बों की फ़रावानी पे
हुस्न-ए-ख़ुद-आरा-ओ-ख़ुद-बीं की दिल-आराई पे इश्क़-ए-मख़मूर की जाँ-सोज़ी-ओ-तन्हाई पे

पहलू-ए-दिल से कहीं लग के कोई रोता है
दस्त-ए-क़ातिल पे कहीं अश्क कहीं धब्बे हैं
दिल मसलता है कोई हाथ में ले कर हर दम
दिल बहुत दुखता है हर बात पे दिल दुखता है
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