सुनो चुन्नू मुन्नू मिरे पास आओ
शकीला जमीला को भी साथ लाओ
शकीला जमीला को भी साथ लाओ
ये देखो मिरे पास क्या आ गई है
ये छोटी सी डिबिया बड़े काम की है
ये डिबिया नहीं मंतरों की छड़ी है
सुनो इस में जादू की पुड़िया पड़ी है
इसे जब घुमाव तो दुनिया घुमाए
ये घर बैठे बैठे सियाहत कराए
इसे खटखटाओ तो घुँघट उठाए
हमें चाँद सी अपनी सूरत दिखाए
इसे जब दबाओ तो ये गुनगुनाए
अनोखे निराले धुनों को सुनाए
बिना कुछ दबाए भी ये बोलती है
बिना कुछ हिलाए भी तो डोलती है
ज़रूरत हो जिस की इसे ये बुला दे
बुला कर उसे हम से बातें करा दे
हमें अपने बिछड़ों से हम को मिला दे
हमारे दिलों में मोहब्बत जगा दे
ये चाहे तो जिस से भी जिस को मिला दे
किसी को किसी से भी चाहे भिड़ा दे
कभी अजनबी को भी साथी बना दे
कभी दोस्त को भी ये दुश्मन बना दे
कभी जो शरारत ये करने पे आए
तो चाहे जिसे रात दिन ये सताए
तिलिस्मी फ़ज़ाएँ भी इस में छुपी हैं
हज़ारों बलाएँ भी इस में दबी हैं
कभी तो ये दुनिया का नक़्शा उभारे
कभी आसमाँ को ज़मीं पर उतारे
कहाँ क्या हुआ सारा क़िस्सा सुनाए
यहाँ का वहाँ का तमाशा दिखाए
ये मशरिक़ को मग़रिब से पल में मिलाए
बस इक आन में दूरियों को मिटाए
ये फोटो भी तो बैठे बैठे उतारे
हमारे भी चेहरे का नक़्शा उभारे
ये देखो तुम्हारा भी फोटो खिंचा है
तुम्हारे भी चेहरों का नक़्शा बना है
नहीं वक़्त का सिर्फ़ चक्कर चलाए
ये डिबिया तो तारीख़ दिन भी बताए
अलार्म भी तो रात में ये बजाए
हमें वक़्त पर ग़फ़लतों से जगाए
मिरे दिल में क्या है इसे ये ख़बर है
मिरे दिल के अंदर भी इस की नज़र है
इलह-दीन का ये दिया तो नहीं है
कि इस में भी तो कोई जिन सा बसा है
कि जब भी बुलाओ तो देखो खड़ा है
जो शय चाहिए इस से हाज़िर किया है
छड़ी की झड़ी देख बच्चे ये बोले
बहुत देर के बा'द मुँह अपना खोले
ये डिबिया तो सच-मुच बड़े काम की है
हमें भी बताओ कहाँ से मिली है
बताओ कि इस का कोई नाम भी है
फ़्री में मिली है या कुछ दाम भी है
Read Fullये छोटी सी डिबिया बड़े काम की है
ये डिबिया नहीं मंतरों की छड़ी है
सुनो इस में जादू की पुड़िया पड़ी है
इसे जब घुमाव तो दुनिया घुमाए
ये घर बैठे बैठे सियाहत कराए
इसे खटखटाओ तो घुँघट उठाए
हमें चाँद सी अपनी सूरत दिखाए
इसे जब दबाओ तो ये गुनगुनाए
अनोखे निराले धुनों को सुनाए
बिना कुछ दबाए भी ये बोलती है
बिना कुछ हिलाए भी तो डोलती है
ज़रूरत हो जिस की इसे ये बुला दे
बुला कर उसे हम से बातें करा दे
हमें अपने बिछड़ों से हम को मिला दे
हमारे दिलों में मोहब्बत जगा दे
ये चाहे तो जिस से भी जिस को मिला दे
किसी को किसी से भी चाहे भिड़ा दे
कभी अजनबी को भी साथी बना दे
कभी दोस्त को भी ये दुश्मन बना दे
कभी जो शरारत ये करने पे आए
तो चाहे जिसे रात दिन ये सताए
तिलिस्मी फ़ज़ाएँ भी इस में छुपी हैं
हज़ारों बलाएँ भी इस में दबी हैं
कभी तो ये दुनिया का नक़्शा उभारे
कभी आसमाँ को ज़मीं पर उतारे
कहाँ क्या हुआ सारा क़िस्सा सुनाए
यहाँ का वहाँ का तमाशा दिखाए
ये मशरिक़ को मग़रिब से पल में मिलाए
बस इक आन में दूरियों को मिटाए
ये फोटो भी तो बैठे बैठे उतारे
हमारे भी चेहरे का नक़्शा उभारे
ये देखो तुम्हारा भी फोटो खिंचा है
तुम्हारे भी चेहरों का नक़्शा बना है
नहीं वक़्त का सिर्फ़ चक्कर चलाए
ये डिबिया तो तारीख़ दिन भी बताए
अलार्म भी तो रात में ये बजाए
हमें वक़्त पर ग़फ़लतों से जगाए
मिरे दिल में क्या है इसे ये ख़बर है
मिरे दिल के अंदर भी इस की नज़र है
इलह-दीन का ये दिया तो नहीं है
कि इस में भी तो कोई जिन सा बसा है
कि जब भी बुलाओ तो देखो खड़ा है
जो शय चाहिए इस से हाज़िर किया है
छड़ी की झड़ी देख बच्चे ये बोले
बहुत देर के बा'द मुँह अपना खोले
ये डिबिया तो सच-मुच बड़े काम की है
हमें भी बताओ कहाँ से मिली है
बताओ कि इस का कोई नाम भी है
फ़्री में मिली है या कुछ दाम भी है
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अम्मी अब्बा कैसे हैं
टेढ़े हैं या सीधे हैं
टेढ़े हैं या सीधे हैं
गुम-सुम रहने वाले हैं
बातें करने वाले हैं
ज़ेहन-ओ-दिल के कैसे हैं
गर्म हैं या फिर ठंडे हैं
प्यार लुटाने वाले हैं
आँख दिखाने वाले हैं
नाज़ उठाने वाले हैं
डाँट पिलाने वाले हैं
दिल्ली में क्यूँ रहते हैं
दिल्ली में क्या करते हैं
खाना कौन बनाता है
उन को कौन खिलाता है
किन से बातें करते हैं
किन की बातें सुनते हैं
तन्हा कैसे रहते हैं
तन्हाई क्यूँ सहते हैं
क्यूँ संडे में आते हैं
अंकल जैसे लगते हैं
संडे में भी सोते हैं
छुट्टी को भी खोते हैं
अम्मी उन से बोलो ना
होंट ज़रा तुम खोलो ना
बोलो उन से पास रहें
हम से भी कुछ बात करें
हम लोगों का हाल सुनें
अपनी कोई बात कहें
बोलो ना कि चुस्त रहें
ऐसे भी न सुस्त रहें
हम को ले कर शहर चलें
घू
में फिरें और मौज करें
हम में कैसी दूरी है
ये कैसी मजबूरी है
Read Fullबातें करने वाले हैं
ज़ेहन-ओ-दिल के कैसे हैं
गर्म हैं या फिर ठंडे हैं
प्यार लुटाने वाले हैं
आँख दिखाने वाले हैं
नाज़ उठाने वाले हैं
डाँट पिलाने वाले हैं
दिल्ली में क्यूँ रहते हैं
दिल्ली में क्या करते हैं
खाना कौन बनाता है
उन को कौन खिलाता है
किन से बातें करते हैं
किन की बातें सुनते हैं
तन्हा कैसे रहते हैं
तन्हाई क्यूँ सहते हैं
क्यूँ संडे में आते हैं
अंकल जैसे लगते हैं
संडे में भी सोते हैं
छुट्टी को भी खोते हैं
अम्मी उन से बोलो ना
होंट ज़रा तुम खोलो ना
बोलो उन से पास रहें
हम से भी कुछ बात करें
हम लोगों का हाल सुनें
अपनी कोई बात कहें
बोलो ना कि चुस्त रहें
ऐसे भी न सुस्त रहें
हम को ले कर शहर चलें
घू
में फिरें और मौज करें
हम में कैसी दूरी है
ये कैसी मजबूरी है
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बहुत ख़ूब-सूरत हमारा वतन है
अनोखा है सब से निराला वतन है
अनोखा है सब से निराला वतन है
सभी रंग के फूल इस में खिले हैं
बहिश्ती मनाज़िर भी इस को मिले हैं
कहीं रात-रानी की ख़ुशबू बसी है
कहीं पर चमेली की निकहत घुली है
कहीं पर धनक सात-रंगी तनी है
कहीं नूर की कोई चादर बिछी है
किसी सम्त में कोई दरिया रवाँ है
कहीं कोहसारों का दिलकश समाँ है
कहीं लाल पीले हरे क़ुमक़ु
में हैं
कहीं पानियों में दिए जल रहे हैं
कहीं पाए जामों में टोपी खड़ी है
कहीं पाँव में कोई धोती बंधी है
कहीं सूट साड़ी की रौनक़ लगी है
कहीं घाघरे की अजब दिलकशी है
किसी की हथेली पे मेहंदी रची है
किसी पाँव में कोई लाली लगी है
किसी सर पे बालों के गुच्छे बने हैं
कहीं बाल पैरों पे लटके हुए हैं
कहीं सात रंगों की पिचकारियाँ हैं
कि जिन से बदन-बीच गुल-कारियाँ हैं
कहीं गेंद बल्ले से लग कर है उड़ती
कहीं कोई डंडे से गिली उछलती
ज़मीं को बिछाए कोई सो रहा है
कई ख़्वाब भी नींद में बो रहा है
कोई पानियों में छलांगें लगाता
ख़लाओं में कोई है कर्तब दिखाता
कोई साँप को अपना साथी बनाता
उसे बीन की अपनी धुन पर नचाता
कोई अपने अंगों का आसन लगाता
कोई अपने तन का तमाशा दिखाता
कोई अपनी आँखों से मन जीतता है
अदाओं से दुनिया का धन जीतता है
जिधर देखिए इक अनोखा समाँ है
उदासी में भी ज़िंदगी शादमाँ है
हर इक तरह से ये नियारा वतन है
बहुत ख़ूब-सूरत हमारा वतन है
Read Fullबहिश्ती मनाज़िर भी इस को मिले हैं
कहीं रात-रानी की ख़ुशबू बसी है
कहीं पर चमेली की निकहत घुली है
कहीं पर धनक सात-रंगी तनी है
कहीं नूर की कोई चादर बिछी है
किसी सम्त में कोई दरिया रवाँ है
कहीं कोहसारों का दिलकश समाँ है
कहीं लाल पीले हरे क़ुमक़ु
में हैं
कहीं पानियों में दिए जल रहे हैं
कहीं पाए जामों में टोपी खड़ी है
कहीं पाँव में कोई धोती बंधी है
कहीं सूट साड़ी की रौनक़ लगी है
कहीं घाघरे की अजब दिलकशी है
किसी की हथेली पे मेहंदी रची है
किसी पाँव में कोई लाली लगी है
किसी सर पे बालों के गुच्छे बने हैं
कहीं बाल पैरों पे लटके हुए हैं
कहीं सात रंगों की पिचकारियाँ हैं
कि जिन से बदन-बीच गुल-कारियाँ हैं
कहीं गेंद बल्ले से लग कर है उड़ती
कहीं कोई डंडे से गिली उछलती
ज़मीं को बिछाए कोई सो रहा है
कई ख़्वाब भी नींद में बो रहा है
कोई पानियों में छलांगें लगाता
ख़लाओं में कोई है कर्तब दिखाता
कोई साँप को अपना साथी बनाता
उसे बीन की अपनी धुन पर नचाता
कोई अपने अंगों का आसन लगाता
कोई अपने तन का तमाशा दिखाता
कोई अपनी आँखों से मन जीतता है
अदाओं से दुनिया का धन जीतता है
जिधर देखिए इक अनोखा समाँ है
उदासी में भी ज़िंदगी शादमाँ है
हर इक तरह से ये नियारा वतन है
बहुत ख़ूब-सूरत हमारा वतन है
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हर इक लब पे तितली बिठाती है इंशा
झड़ी क़हक़हों की लगाती है इंशा
मसर्रत की दुनिया बसाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कभी माइशा को हँसाती है इंशा
कभी माइशा को रुलाती है इंशा
कभी पास उस को बुलाती है इंशा
कभी दूर उस को भगाती है इंशा
बहन से तो कसरत कराती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कहानी सुनाती है नानी को इंशा
अदाएँ दिखाती है नानी को इंशा
मसर्रत दिलाती है नानी को इंशा
दिवाना बनाती है नानी को इंशा
जवानी बुढ़ापे में लाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कभी ढूँड लाती है नानू का चश्मा
कभी फेंक आती है नानू का चश्मा
कभी ख़ुद लगाती है नानू का चश्मा
कहीं से भी पाती है नानू का चश्मा
तो आवाज़ फ़ौरन लगाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मोबाइल पर इस तरह उँगली घुमाए
कि जैसे कोई शख़्स जादू चलाए
मोबाइल के पर्दे पे हैरत उगाए
हज़ारों तरह के करिश्में दिखाए
दिखा कर करिश्में रिझाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कभी कोई खाने का मंज़र दिखाए
कभी अपनी उँगली से पिज़्ज़ा बनाए
कभी तो मज़ेदार मुर्ग़ा पकाए
सलादों से खाने की थाली सजाए
कभी चाय काफ़ी पिलाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
फ़लक पास जा कर कभी मुस्कुराती
कभी छेड़ती तो कभी गुदगुदाती
महक को कभी अपना कर्तब दिखाती
कभी बेबी नन्ना को पोयम सुनाती
हर इक आदमी को लुभाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मलाहत में इस की चमक है ग़ज़ब की
सरापे में इस के लचक है ग़ज़ब की
सदाओं में इस की खनक है ग़ज़ब की
अदाओं में इस की चहक है ग़ज़ब की
ग़ज़ब का नज़ारा दिखाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
चहेती किसी की किसी की दुलारी
किसी को लगे सारे दुनिया से न्यारी
किसी को हो महसूस फूलों से भारी
सनी को तो है जान-ओ-दिल से भी प्यारी
बहुत आमना को भी भाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मोबाइल पे अब्बा को देखे तो डोले
चहक कर लपक कर ज़बाँ अपनी खोले
मसर्रत से लबरेज़ अल्फ़ाज़ बोले
शहद कान में अपने अब्बा के घोले
क़तर तक मोहब्बत लुटाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मोबाइल पे फ़रहान ख़ाँ की ज़बानी
हर इक रात सुनती है वो इक कहानी
कहानी में आती है जब कोई रानी
तो बच्ची से बन जाती है वो सियानी
बहुत दाद अब्बास पाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कभी अपने घोड़े से भौं भौं कराए
कभी शे'र चीते को बकरी बनाए
कभी सर पे बिल्ली के हाथी बिठाए
कभी डॉरीमॉन को भी पट्टी पढ़ाए
अनोखे तमाशे दिखाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मगर खाने पीने से जी है चुराती
ज़रा देर में मुँह में लुक़्मा गिराती
बहुत अपनी अम्माँ से कसरत कराती
कभी नाच तिगड़ी का भी वो नचाती
खिलाने में पागल बनाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
Read Fullझड़ी क़हक़हों की लगाती है इंशा
मसर्रत की दुनिया बसाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कभी माइशा को हँसाती है इंशा
कभी माइशा को रुलाती है इंशा
कभी पास उस को बुलाती है इंशा
कभी दूर उस को भगाती है इंशा
बहन से तो कसरत कराती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कहानी सुनाती है नानी को इंशा
अदाएँ दिखाती है नानी को इंशा
मसर्रत दिलाती है नानी को इंशा
दिवाना बनाती है नानी को इंशा
जवानी बुढ़ापे में लाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कभी ढूँड लाती है नानू का चश्मा
कभी फेंक आती है नानू का चश्मा
कभी ख़ुद लगाती है नानू का चश्मा
कहीं से भी पाती है नानू का चश्मा
तो आवाज़ फ़ौरन लगाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मोबाइल पर इस तरह उँगली घुमाए
कि जैसे कोई शख़्स जादू चलाए
मोबाइल के पर्दे पे हैरत उगाए
हज़ारों तरह के करिश्में दिखाए
दिखा कर करिश्में रिझाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कभी कोई खाने का मंज़र दिखाए
कभी अपनी उँगली से पिज़्ज़ा बनाए
कभी तो मज़ेदार मुर्ग़ा पकाए
सलादों से खाने की थाली सजाए
कभी चाय काफ़ी पिलाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
फ़लक पास जा कर कभी मुस्कुराती
कभी छेड़ती तो कभी गुदगुदाती
महक को कभी अपना कर्तब दिखाती
कभी बेबी नन्ना को पोयम सुनाती
हर इक आदमी को लुभाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मलाहत में इस की चमक है ग़ज़ब की
सरापे में इस के लचक है ग़ज़ब की
सदाओं में इस की खनक है ग़ज़ब की
अदाओं में इस की चहक है ग़ज़ब की
ग़ज़ब का नज़ारा दिखाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
चहेती किसी की किसी की दुलारी
किसी को लगे सारे दुनिया से न्यारी
किसी को हो महसूस फूलों से भारी
सनी को तो है जान-ओ-दिल से भी प्यारी
बहुत आमना को भी भाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मोबाइल पे अब्बा को देखे तो डोले
चहक कर लपक कर ज़बाँ अपनी खोले
मसर्रत से लबरेज़ अल्फ़ाज़ बोले
शहद कान में अपने अब्बा के घोले
क़तर तक मोहब्बत लुटाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मोबाइल पे फ़रहान ख़ाँ की ज़बानी
हर इक रात सुनती है वो इक कहानी
कहानी में आती है जब कोई रानी
तो बच्ची से बन जाती है वो सियानी
बहुत दाद अब्बास पाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
कभी अपने घोड़े से भौं भौं कराए
कभी शे'र चीते को बकरी बनाए
कभी सर पे बिल्ली के हाथी बिठाए
कभी डॉरीमॉन को भी पट्टी पढ़ाए
अनोखे तमाशे दिखाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
मगर खाने पीने से जी है चुराती
ज़रा देर में मुँह में लुक़्मा गिराती
बहुत अपनी अम्माँ से कसरत कराती
कभी नाच तिगड़ी का भी वो नचाती
खिलाने में पागल बनाती है इंशा
मिरे घर को जन्नत बनाती है इंशा
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वो आग़ोश जिस में पले
और पल कर जवाँ हम हुए हैं
और पल कर जवाँ हम हुए हैं
उसे छोड़ने की तदाबीर करने में मसरूफ़ ऐसे हुए हैं
कि ज़िंदाँ से क़ैदी रिहाई की राहों की
ता'मीर करने में मशग़ूल होते हैं जैसे
वो आग़ोश जिस में जवाँ हम हुए हैं
उसे छोड़ कर दूर जाने के एहसास से
जो ख़ुशी मिल रही है
किसी भी तरह इस से कमतर नहीं है
जो ज़िंदाँ से बाहर निकलने में महसूस होती है ज़िंदानियों को
ख़ुश का ये एहसास
ऐसा नहीं कि फ़क़त एक हम तक ही महदूद हो
ये ख़ुशी घर के दीवार-ओ-दर में भी घर कर गई है
माँ बहन बाप भाई भी गर्दन उठाए हुए
अपने हम-सायों से कहते फिरते नज़र आ रहे हैं
कि मेरा क़मर भी अरब जा रहा है
शरीक-ए-सफ़र की रगों में भी ख़ुशियाँ उछलने लगी हैं
वो रातों की सब लज़्ज़तें भूल कर
जाने वाले की तय्यारियों में
बड़े चाव से मुंहमिक हो गई है
अजब जाँ-फ़िज़ा है ये हिजरत का मंज़र
मगर ये रिवायत है
मक्के से यसरिब को जाते हुए
मुस्तफ़ा और सारे सहाबी बहुत रो रहे थे
वतन की मोहब्बत इन्हें रोकती थी
जुदाई जिगर में तबर भौंकती थी
वो हिजरत का मंज़र बड़ा जाँ-गुसिल था
मगर आज हिजरत का मंज़र बदल सा गया है
ये मंज़र तो सच-मुच बड़ा जाँ-फ़िज़ा है
मगर ऐसा क्यूँ हुआ है
यहाँ तो मज़ालिम की वो सख़्तियाँ भी नहीं हैं
Read Fullकि ज़िंदाँ से क़ैदी रिहाई की राहों की
ता'मीर करने में मशग़ूल होते हैं जैसे
वो आग़ोश जिस में जवाँ हम हुए हैं
उसे छोड़ कर दूर जाने के एहसास से
जो ख़ुशी मिल रही है
किसी भी तरह इस से कमतर नहीं है
जो ज़िंदाँ से बाहर निकलने में महसूस होती है ज़िंदानियों को
ख़ुश का ये एहसास
ऐसा नहीं कि फ़क़त एक हम तक ही महदूद हो
ये ख़ुशी घर के दीवार-ओ-दर में भी घर कर गई है
माँ बहन बाप भाई भी गर्दन उठाए हुए
अपने हम-सायों से कहते फिरते नज़र आ रहे हैं
कि मेरा क़मर भी अरब जा रहा है
शरीक-ए-सफ़र की रगों में भी ख़ुशियाँ उछलने लगी हैं
वो रातों की सब लज़्ज़तें भूल कर
जाने वाले की तय्यारियों में
बड़े चाव से मुंहमिक हो गई है
अजब जाँ-फ़िज़ा है ये हिजरत का मंज़र
मगर ये रिवायत है
मक्के से यसरिब को जाते हुए
मुस्तफ़ा और सारे सहाबी बहुत रो रहे थे
वतन की मोहब्बत इन्हें रोकती थी
जुदाई जिगर में तबर भौंकती थी
वो हिजरत का मंज़र बड़ा जाँ-गुसिल था
मगर आज हिजरत का मंज़र बदल सा गया है
ये मंज़र तो सच-मुच बड़ा जाँ-फ़िज़ा है
मगर ऐसा क्यूँ हुआ है
यहाँ तो मज़ालिम की वो सख़्तियाँ भी नहीं हैं
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ज़ेहन के ख़ानों में जाने वक़्त ने क्या भर दिया
बे-सबब होने लगी इक एक से अन-बन मिरी
जैसे जैसे गुत्थियों की डोर हाथ आती गई
कुछ इसी रफ़्तार से बढ़ती गई उलझन मिरी
ऐसा लगता है कि मेरी साँस फिर घुट जाएगी
फिर अना की नोक पर उठने लगी गर्दन मिरी
क्या कोई साया तुलू होने लगा है फिर इधर
फिर से क्यूँ होने लगी है दूधिया चिलमन मिरी
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किसी मक़ाम पे वो भी बिछड़ गई मुझ से
निगाह-ए-शौक़ जो देती थी हौसला मुझ को
कि हम-सफ़र को समझने लगा ख़िज़र अपना
ज़रूरतों ने कुछ ऐसा सफ़र दिया मुझ को
तमाम लोग ही दुश्मन दिखाई देते हैं
कोई बताए कि आख़िर ये क्या हुआ मुझ को
मैं तेरी कार का उखड़ा हुआ कोई पुर्ज़ा
सुकूँ तलब है तो मेरी जगह पे ला मुझ को
मिरा वजूद भी क़क़नुस से कम नहीं है मियाँ
यक़ीं न आए तो पूरी तरह जला मुझ को
मैं ऐसा नर्म तबीअत कभी न था पहले
ज़रूर लम्स कोई उस का छू गया मुझ को
मैं चाह कर भी तुझे क़त्ल कर न पाऊँगा
ये किस का दे दिया तू ने भी वास्ता मुझ को
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अजीब शख़्स है पहले मुझे हँसाता है
फिर इस के बअ'द बहुत देर तक रुलाता है
फिर इस के बअ'द बहुत देर तक रुलाता है
वो बे-वफ़ा है हमेशा ही दिल दुखाता है
मगर ये क्या कि वही एक हम को भाता है
वो होश गोश का इंसाँ है फिर भी सहरा में
किसी दिवाने की सूरत सदा लगाता है
ख़िज़र तो आते नहीं हैं मिरे ख़राबे में
ये कौन है जो मुझे रास्ता दिखाता है
हर एक रात कहीं दूर भाग जाता हूँ
हर एक सुब्ह कोई मुझ को खींच लाता है
कभी वो मुझ को उड़ाता है आसमानों में
कभी ज़मीन पे ला कर मुझे गिराता है
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ये तमन्ना नहीं कि मर जाएँ
ज़िंदा रहने मगर किधर जाएँ
ज़िंदा रहने मगर किधर जाएँ
ऐसी दहशत कि अपने सायों को
लोग दुश्मन समझ के डर जाएँ
वो जो पूछे तो दिल को ढारस हो
वो जो देखे तो ज़ख़्म भर जाएँ
बच के दुनिया से घर चले आए
घर से बचने मगर किधर जाएँ
इक ख़्वाहिश है जिस्म से मेरे
जल्द से जल्द बाल-ओ-पर जाएँ
अब के लम्बा बहुत सफ़र इन का
इन परिंदों के पर कतर जाएँ
सोचते ही रहेंगे हम शायद
वो बलाएँ तो उन के घर जाएँ
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देख के सर पर गहरा बादल ख़ुश्क निगाहें कहती हैं
आज हमें ये अब्र यक़ीनन पानी दे कर जाएगा
कुछ ठहराव तो बे-शक उस से मेरे घर में आया है
लेकिन इक दिन मुझ को वो तुग़्यानी दे कर जाएगा
आएगा तो इक दो पल मेहमान रहेगा आँखों में
जाएगा तो इक क़िस्सा तूलानी दे कर जाएगा
काग़ज़ के ये फूल भी अपने चेहरों को फ़क़ पाएँगे
अब के मौसम इन को भी हैरानी दे कर जाएगा
खुश-मंज़र पे आँख जमाए बैठे हैं कि लगता है
रंग कोई बे-रंग नज़र को धानी दे कर जाएगा
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