Moin Hasan

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    किसी के ऐब बताना कोई कमाल नहीं
    किसी के ऐब छिपाना कलाम होता हैं
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    मैं रक़्स क्यो न करू यार अपनी किस्मत पर
    के भीख मिलती हैं जिससे वो दर तुम्हारा हैं
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    रब-ए-कायनात
    दस्त-ए-करम बढा मिरी जानिब मिरे खुदा
    खादिम ये दस्त-बस्ता खडा हैं दयार पर
    मैंने मुनाफिकों के हैं लश्कर गिरा दिए
    तेरा गुलाब तन्हा हैं ग़ालिब हज़ार पर
    मेरी तरफ निगाह क' ऐ रब-ए-कायनात
    बैठा हूँ गम ज़दा मैं ही अपने मज़ार पर
    ऐ रब-ए-कायनात तू यकता हैं जिस तरह
    मुझको भी उस तरह से अकेला बना दिया
    ऐ रब-ए-कायनात मुझे खत नहीं मिला
    ऐ रब-ए-कायनात कबूतर को भेज दे
    ऐ रब-ए-कायनात ये जंगल तवील हैं
    रस्ता दिखाने मील के पत्थर को भेज दे
    ऐ रब-ए-कायनात मुहब्बत शनास हूँ
    मैं मुन्तज़िर हूँ तू मिरे दिल-बर को भेज दे
    ऐ रब-ए-कायनात ये तिशना लबी तो देख
    होठों को मेरे जाम ए कौसर नसीब कर
    ऐ रब-ए-कायनात मिरी बात सुन ज़रा
    दुनिया में नफरतों के हैं शोले भड़क रहे
    ऐ रब-ए-कायनात तअस्सुब को खत्म कर
    हमको तिरी जबीन से दुगना लगाव हैं
    ऐ रब-ए-कायनात हमारी नज़र को देख
    आँसू भी आबशार की मानिंद बह गए
    ऐ रब-ए-कायनात शिकायत करे किसे
    तेरे सिवा किसी को हमारी नहीं पड़ी
    ऐ रब-ए-कायनात वबा का इलाज कर
    इंसान थक गया हैं अबाबील भेज दे
    ऐ रब-ए-कायनात बचा ऐसी मोत से
    कोई क़फ़त नहीं हैं ज़नाज़े उठाए कौन
    ऐ रब-ए-कायनात हमारी दुआ को सुन
    अब तो मिरी ज़बान से छाले निकल गए
    ऐ रब-ए-कायनात हमारा नहीं कोई
    इक तेरे आसरे प' जिए जा रहे हैं हम
    ऐ रब-ए-कायनात हमे इश्क़ खा गया
    तस्वीर तेरी याद की दीमग निगल गई
    मैसेज हमने फ़ोन से सारे मिटा दिए
    जो खत बचे थे पासमे सारे जला दिए
    यादों से तेरी पीछा छुड़ाने मैं लगा हूँ
    ऐ रब-ए-कायनात मुझे कोई हल बता
    या फिर यही हैं ठीक ज़हर कर हमे अता
    ऐ रब-ए-कायनात ज़हर हैं हवाओं में
    ऐ रब-ए-कायनात हवाओं को साफ कर
    मैं हाथ जोड़ता हूँ गुनाहों को माफ कर
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    Moin Hasan
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    तुम्हारा ज़िक्र अगर छेड़ दु फसाने में
    इज़ाफ़ा होता रहेगा मिरे खज़ामे में

    कोई भी तीर नहीं लग रहा निशाने पर
    कोई न कोई खराबी हैं इस निशाने में

    ख़याल आते हैं , मज़मून बांध जाते हैं
    ग़ज़ल पनपती हैं मिसरे को गुनगुनाने में

    तमाम काम सहूलत से हो रहे हैं दोस्त
    लगा दी हैं तिरी तस्वीर कारखाने में

    अभी तो फ़ोन से नंबर नहीं मिटाया हैं
    अभी तो वक़्त लगेगा उसे भुलाने में

    सुना था सात बशर एक जैसे होते हैं
    मगर वो यकता नज़र आता हैं ज़माने में

    तिरा मिज़ाज़ भी थोड़ा सा तल्ख़ लगता हैं
    नमक भी ज़ादा पड़ा आज तुझसे खाने में
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    Moin Hasan
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    करते हैं फ़ातिहा भी दुरूद-ओ-सलाम भी
    अफ़्ज़ल था मरने वालों तुम्हारा मक़ाम भी

    ये ख़्वाब हैं कि सचमें रिˈऐलटि हैं मेरे दोस्त
    वो मेरे सामने भी हैं और हम-कलाम भी

    आक़ा से कहना दिल नहीं लगता गुलाम का
    और पेश करना हाजियो मेरा सलाम भी

    हम दूर हो के पास हैं और पास हो के दूर
    जिस्मो से हम अलग भी हैं दिल से तवाम भी

    अंधा हैं मेरे शहर का हाकिम भी दोस्तों
    गूंगी हैं मेरे शहर की सारी अवाम भी

    होठों पे खिलता जाए हैं पौधा गुलाब का
    आँखों में खींचा आए हैं माह ए तमाम भी

    मुद्दत से मैं सफर में हूँ और बे-क़याम हूँ
    मिल जाए तेरी बाहों में अब तो क़याम भी

    हम दोस्त बन गए हैं बिछड़ने के बाद में
    हल्की सी रोशनी तो हैं ज़ुल्मत की शाम भी
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    Moin Hasan
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    उसकी मजबूरियां समझता हूँ
    फिर भी कैसे जुदा करू उसको
    Moin Hasan
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    उसके हाथों से गिरे चाँद सितारे ऐसे
    जैसे मसनद से कोई खाक़ नशी होता हैं

    तेरी बाहों से निकलने का खयाल आए क्यो
    उम्र की कैद से कब कैदी बरी होता हैं
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    Moin Hasan
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    दरिया गहरा हैं मगर पार किया जाएगा
    बीच से राह को हमवार किया जाएगा

    मैं परिंदों की मुहब्बत में मरूँगा इक दिन
    मुझको मिन-जुम्ला-ए-अशजार किया जाएगा
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    Moin Hasan
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    इतना जल्दी न रखो यार बदन तय कर के
    हमने देखा भी नहीं तुमको अभी जी भर के

    इक तो वो मोम बदन और लताफ़त से चूर
    हाथ भी उसको लगाया था मैंने डर डर के
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    Moin Hasan
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    वो एक शख्स जो सो बार बे-वफ़ा निकला
    वो चाहता हैं के हम अब भी उससे प्यार करे
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