करते हैं फ़ातिहा भी दुरूद-ओ-सलाम भी

अफ़्ज़ल था मरने वालों तुम्हारा मक़ाम भी

ये ख़्वाब हैं कि सच
में रिˈऐलटि हैं मेरे दोस्त
वो मेरे सामने भी हैं और हम-कलाम भी

आक़ा से कहना दिल नहीं लगता ग़ुलाम का
और पेश करना हाजियो मेरा सलाम भी

हम दूर हो के पास हैं और पास हो के दूर
जिस्मो से हम अलग भी हैं दिल से तवाम भी

अंधा हैं मेरे शहर का हाकिम भी दोस्तों
गूंगी हैं मेरे शहर की सारी अवाम भी

होंठों पे खिलता जाए हैं पौधा गुलाब का
आँखों में खींचा आए हैं माह ए तमाम भी

मुद्दत से मैं सफ़र में हूँ और बे-क़याम हूँ
मिल जाए तेरी बाहों में अब तो क़याम भी

हम दोस्त बन गए हैं बिछड़ने के बा'द में
हल्की सी रौशनी तो हैं ज़ुल्मत की शाम भी

— Moin Hasan

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Anjam Shayari

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