चमचमाती हुई तलवार से निस्बत होवे

ऐ मिरे ग़म तुझे गम-खार से निस्बत हो

मेरे बच्चे तिरे अफ़साने पढ़े मकतब में
शाहजादी तुझे सालार से निस्बत होवे

ठोकरे मार के मसनद से उठाओं दिल की
जिस किसी को यहाँ दस्तार से निस्बत होवे

वो मिरे साथ हैं तो इस
में तुम्हें हैरत क्या
एक बीमार को बीमार से निस्बत होवे

रक़्स करता हुआ जन्नत की तरफ़ जाए वो
जिस को पैग़म्बर-ए-अनवार से निस्बत होवे

कब मिरी खाना-बदोशी को करार आए हैं
मुझ को भी कब दर-ओ-दीवार से निस्बत होवे

घर के सोफे पे नहीं दिल में बिठाऊँ उस को
जिस को भी हैदर-ए-कर्रार से निस्बत होवे

बे-सबब गिरती चली जाए हैं कीमत उस की
जिस के मायार को बाजार से निस्बत होवे

दश्त-दर-दश्त फुरूँ अश्क लिए आँखों में
कैसा की तरह ग़म-ए-यार से निस्बत होवे

— Moin Hasan

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Rahbar Shayari

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