मुझ सेे वहशत बसर नहीं होती
ये मुहब्बत अगर नहीं होती
अब हमारी ख़बर वो देते हैं
जिन को अपनी ख़बर नहीं होती
अश्क़-ए-नादां कहाँ कहाँ फिरता
गर तिरी चश्म-ए-तर नहीं होती
बात बस मुख़्तसर यही हैं कि
बात भी मुख़्तसर नहीं होती
गुफ़्तगू करता हूँ तसव्वुर में
बात होती हैं पर नहीं होती
दश्त-ए-हिज्रा में रास्ता कैसा.!
शाम-ए-गम की सहर नहीं होती
अब मैं सय्यद को आप कहता हूँ
अब दुआ बे-असर नहीं होती
— Moin Hasan















