न जाने क्यूँ
    मुझे अक्सर गुमान होता है
    मह-ए-तमाम फ़क़त देखता नहीं है हमें
    वो जब्र-ओ-क़ैद-ए-मुसलसल पे इक मशक़्क़त की
    हज़ारों साल से इस बे-कराँ मसाफ़त की
    बिसात-ए-वक़्त की
    इक दास्ताँ सुनाता है
    समझ सकें तो
    बहुत कुछ हमें बताता है
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    हुस्न मंज़र में कहाँ है
    ये हमारे मन की आँखों में कहीं है
    मन की आँखें खुल सकें जो
    तो हर इक मंज़र हसीं है
    हुस्न मंज़र में नहीं है
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    एक अजीब ख़्वाहिश है
    इस ज़मीं के कोने में
    सिर्फ़ मह-जबीनों की
    सब की सब हसीनों की
    अपनी एक बस्ती हो
    ज़िंदगी जहाँ हर पल खिलखिला के हँसती हो
    रंग-ओ-नूर की बारिश
    हर घड़ी बरसती हो
    सब ग़ज़ाल-नैनों में
    शोख़ सी शरारत हो
    इन की जुम्बिश-ए-लब से
    ज़िंदगी इबारत हो
    ख़ुशियों का झमेला हो
    पलकों पे सितारे हों
    रौशनी का रेला हो
    ख़ुशबुओं का मेला हो
    और मह-जबीनों की इस हसीन बस्ती में
    एक सिर्फ़ मेरा ही
    चूड़ियों का ठेला हो
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    शुऊर-ए-ज़ात के साँचे में ढलना चाहता हूँ
    मैं गिरने से बहुत पहले सँभलना चाहता हूँ

    लिबास-ए-आदम-ए-ख़ाकी बदलना चाहता हूँ
    मैं अपने जिस्म से बाहर निकलना चाहता हूँ

    तुम्हारी याद की बारिश में जलना चाहता हूँ
    मैं संग-ओ-ख़िश्त हूँ लेकिन पिघलना चाहता हूँ

    मिरे अंदर ख़ज़ाने हैं उगलना चाहता हूँ
    तह-ए-पाताल को छू कर उछलना चाहता हूँ

    मुझे पीछे नहीं रहना है जीने की तमन्ना
    हुसैन इब्न-ए-अली के साथ चलना चाहता हूँ
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    वक़्त पर इश्क़-ए-ज़ुलेख़ा का असर लगता है
    आख़िर-ए-उम्र भी आग़ाज़-ए-सफ़र लगता है

    ये समुंदर है मगर सोख़्ता-जाँ शाइ'र को
    किसी मजबूर का इक दीदा-ए-तर लगता है

    सुब्ह-ए-ताज़ा है मुक़द्दर दिल-ए-मायूस ठहर
    शजर-ए-उम्मीद पे इनआ'म-ए-समर लगता है

    मैं ज़बाँ-बंदी का ये अहद नहीं तोडूँगा
    हाँ मगर इस दिल-ए-गुस्ताख़ से डर लगता है

    हमें इदराक-ए-मोहब्बत तो नहीं है लेकिन
    इतना मालूम है इस खेल में सर लगता है
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    जफ़ा-ए-अहद का इल्ज़ाम उलट भी सकता हूँ
    उसे यक़ीन न था मैं पलट भी सकता हूँ

    मैं अपने इश्क़ में शाहीं मिज़ाज रखता हूँ
    पलट तो जाता हूँ लेकिन झपट भी सकता हूँ

    जुनूँ में ज़ुल्म की गर्दन उतार लेता हूँ
    तो इक निगाह-ए-मोहब्बत में कट भी सकता हूँ

    अदू-ए-शहर मैं बारूद हूँ मोहब्बत का
    हदों से बात बढ़ेगी तो फट भी सकता हूँ

    बिसात-ए-अर्ज़ पे चाहूँ तो फैल जाऊँ मैं
    हो रम्ज़-ए-यार तो दिल में सिमट भी सकता हूँ
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    गिन रहे हैं दिल-ए-नाकाम के दिन
    फिर वही गर्दिश-ए-अय्याम के दिन

    दुख से आग़ाज़ और ग़म पे अख़ीर
    हम ने पाए बड़े इनआ'म के दिन

    है यही सोच कर आराम हमें
    मिल गए हैं उन्हें आराम के दिन

    अब नहीं काम कोई दुनिया का
    गोया ये दिन हैं बड़े काम के दिन

    हैं वो फिर से मिरे नज़दीक 'नईम'
    आए अंदेशा-ए-अंजाम के दिन
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    बिखरा है कई बार समेटा है कई बार
    ये दिल तिरे अतराफ़ को निकला है कई बार

    जिस चाँद के दीदार की हसरत में है दुनिया
    वो शाम ढले घर मिरे उतरा है कई बार

    सुन कर तुझे मदहोश ज़माना है मुझे देख
    जिस ने तिरी आवाज़ को देखा है कई बार

    अफ़्सोस कि है इश्क़-ए-यगाना से बहुत दूर
    यारो तुम्हें हर रोज़ जो होता है कई बार
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    वो मिरे दिल में यूँ समा के गई
    लाख चाहा मगर न जा के गई

    एक अर्सा हुआ कभी न खुली
    दिल पे जो गिरह वो लगा के गई

    रात ग़म की कटे नहीं कटती
    सुब्ह इक पल में मुस्कुरा के गई

    मान टूटे तो फिर नहीं जुड़ता
    बद-गुमानी कभी न आ के गई

    ऐ 'नईम' अब न वापसी होगी
    बारहा ज़िंदगी बता के गई
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    Naeem Zarrar Ahmad
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    ग़ैर के घर सही वो आया तो
    ग़म ही मेरे लिए वो लाया तो

    दुश्मनों को मुआ'फ़ कर डाला
    दोस्तों से फ़रेब खाया तो

    पेड़ के घोंसलों का क्या होगा
    घर उसे काट कर बनाया तो

    फिर मिरे सामने थी इक दीवार
    एक दीवार को गिराया तो

    किस क़दर ज़ोर से हुई बारिश
    मैं ने काग़ज़ का घर बनाया तो

    क्या करोगे 'नईम' साल-ए-नौ
    पेश-रौ की तरह ही आया तो
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    Naeem Zarrar Ahmad
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