न जाने क्यूँ
मुझे अक्सर गुमान होता है
मुझे अक्सर गुमान होता है
मह-ए-तमाम फ़क़त देखता नहीं है हमें
वो जब्र-ओ-क़ैद-ए-मुसलसल पे इक मशक़्क़त की
हज़ारों साल से इस बे-कराँ मसाफ़त की
बिसात-ए-वक़्त की
इक दास्ताँ सुनाता है
समझ सकें तो
बहुत कुछ हमें बताता है
Read Fullवो जब्र-ओ-क़ैद-ए-मुसलसल पे इक मशक़्क़त की
हज़ारों साल से इस बे-कराँ मसाफ़त की
बिसात-ए-वक़्त की
इक दास्ताँ सुनाता है
समझ सकें तो
बहुत कुछ हमें बताता है
10
0 Likes
9
0 Likes
एक अजीब ख़्वाहिश है
इस ज़मीं के कोने में
इस ज़मीं के कोने में
सिर्फ़ मह-जबीनों की
सब की सब हसीनों की
अपनी एक बस्ती हो
ज़िंदगी जहाँ हर पल खिलखिला के हँसती हो
रंग-ओ-नूर की बारिश
हर घड़ी बरसती हो
सब ग़ज़ाल-नैनों में
शोख़ सी शरारत हो
इन की जुम्बिश-ए-लब से
ज़िंदगी इबारत हो
ख़ुशियों का झमेला हो
पलकों पे सितारे हों
रौशनी का रेला हो
ख़ुशबुओं का मेला हो
और मह-जबीनों की इस हसीन बस्ती में
एक सिर्फ़ मेरा ही
चूड़ियों का ठेला हो
Read Fullसब की सब हसीनों की
अपनी एक बस्ती हो
ज़िंदगी जहाँ हर पल खिलखिला के हँसती हो
रंग-ओ-नूर की बारिश
हर घड़ी बरसती हो
सब ग़ज़ाल-नैनों में
शोख़ सी शरारत हो
इन की जुम्बिश-ए-लब से
ज़िंदगी इबारत हो
ख़ुशियों का झमेला हो
पलकों पे सितारे हों
रौशनी का रेला हो
ख़ुशबुओं का मेला हो
और मह-जबीनों की इस हसीन बस्ती में
एक सिर्फ़ मेरा ही
चूड़ियों का ठेला हो
8
0 Likes
शुऊर-ए-ज़ात के साँचे में ढलना चाहता हूँ
मैं गिरने से बहुत पहले सँभलना चाहता हूँ
मैं गिरने से बहुत पहले सँभलना चाहता हूँ
लिबास-ए-आदम-ए-ख़ाकी बदलना चाहता हूँ
मैं अपने जिस्म से बाहर निकलना चाहता हूँ
तुम्हारी याद की बारिश में जलना चाहता हूँ
मैं संग-ओ-ख़िश्त हूँ लेकिन पिघलना चाहता हूँ
मिरे अंदर ख़ज़ाने हैं उगलना चाहता हूँ
तह-ए-पाताल को छू कर उछलना चाहता हूँ
मुझे पीछे नहीं रहना है जीने की तमन्ना
हुसैन इब्न-ए-अली के साथ चलना चाहता हूँ
7
0 Likes
ये समुंदर है मगर सोख़्ता-जाँ शाइ'र को
किसी मजबूर का इक दीदा-ए-तर लगता है
सुब्ह-ए-ताज़ा है मुक़द्दर दिल-ए-मायूस ठहर
शजर-ए-उम्मीद पे इनआ'म-ए-समर लगता है
मैं ज़बाँ-बंदी का ये अहद नहीं तोडूँगा
हाँ मगर इस दिल-ए-गुस्ताख़ से डर लगता है
हमें इदराक-ए-मोहब्बत तो नहीं है लेकिन
इतना मालूम है इस खेल में सर लगता है
6
0 Likes
मैं अपने इश्क़ में शाहीं मिज़ाज रखता हूँ
पलट तो जाता हूँ लेकिन झपट भी सकता हूँ
जुनूँ में ज़ुल्म की गर्दन उतार लेता हूँ
तो इक निगाह-ए-मोहब्बत में कट भी सकता हूँ
अदू-ए-शहर मैं बारूद हूँ मोहब्बत का
हदों से बात बढ़ेगी तो फट भी सकता हूँ
बिसात-ए-अर्ज़ पे चाहूँ तो फैल जाऊँ मैं
हो रम्ज़-ए-यार तो दिल में सिमट भी सकता हूँ
5
0 Likes
दुख से आग़ाज़ और ग़म पे अख़ीर
हम ने पाए बड़े इनआ'म के दिन
है यही सोच कर आराम हमें
मिल गए हैं उन्हें आराम के दिन
अब नहीं काम कोई दुनिया का
गोया ये दिन हैं बड़े काम के दिन
हैं वो फिर से मिरे नज़दीक 'नईम'
आए अंदेशा-ए-अंजाम के दिन
4
0 Likes
बिखरा है कई बार समेटा है कई बार
ये दिल तिरे अतराफ़ को निकला है कई बार
ये दिल तिरे अतराफ़ को निकला है कई बार
जिस चाँद के दीदार की हसरत में है दुनिया
वो शाम ढले घर मिरे उतरा है कई बार
सुन कर तुझे मदहोश ज़माना है मुझे देख
जिस ने तिरी आवाज़ को देखा है कई बार
अफ़्सोस कि है इश्क़-ए-यगाना से बहुत दूर
यारो तुम्हें हर रोज़ जो होता है कई बार
3
0 Likes
2
0 Likes
ग़ैर के घर सही वो आया तो
ग़म ही मेरे लिए वो लाया तो
ग़म ही मेरे लिए वो लाया तो
दुश्मनों को मुआ'फ़ कर डाला
दोस्तों से फ़रेब खाया तो
पेड़ के घोंसलों का क्या होगा
घर उसे काट कर बनाया तो
फिर मिरे सामने थी इक दीवार
एक दीवार को गिराया तो
किस क़दर ज़ोर से हुई बारिश
मैं ने काग़ज़ का घर बनाया तो
क्या करोगे 'नईम' साल-ए-नौ
पेश-रौ की तरह ही आया तो
1
0 Likes









