बढ़ा जो हाथ तो दीवार बीच में आई
उठी निगाह तो मीनार बीच में आई
उठी निगाह तो मीनार बीच में आई
सफ़र सभी का मुअ'य्यन है एक ही दर तक
तो किस सबब से ये रफ़्तार बीच में आई
हिसार-ए-फ़र्क़ कभी का सिमट गया होता
कभी अना कभी दस्तार बीच में आई
समझना सोचना सुनना जहाँ नहीं मुमकिन
कहाँ से इश्क़ में गुफ़्तार बीच में आई
दर-ए-बहिश्त रहा दो क़दम कि लौट आया
वतन की सूरत-ए-लाचार बीच में आई
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जहाँ छू के देखूँ वहीं पर ख़ला है
हवा में हवा के सिवा और क्या है
हवा में हवा के सिवा और क्या है
तिरे बा'द ये हाल है शह्र-ए-दिल का
न बारिश न तूफ़ाँ न बाद-ए-सबा है
लिखा है जो नज़रों ने लौह-ए-नज़र पर
वो दिल के सिवा और किस ने पढ़ा है
धंसकने लगा है वो कमरा कि जिस में
परिंदों का छोड़ा हुआ घोंसला है
खुला है कहीं इक दरीचा अभी भी
कि जिस में कोई ख़ूब-सूरत खड़ा है
मिरा दर्द मेरा है उस का उसी का
तो क्यूँ ग़म-गुसारी का ये सिलसिला है
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जो नहीं है उसी खुले दर को
जा रहा हूँ मैं छोड़ कर घर को
जा रहा हूँ मैं छोड़ कर घर को
अपनी दहलीज़ से मैं ता-मंज़िल
ढूँढ़ता ही रहा हूँ रहबर को
क्या करूँ जा के क़ब्र में लेटूँ
कैसे भूलूँ मैं मौत के डर को
तू भी आता है साथ-साथ कि जब
याद करता हूँ अपने दिलबर को
जा रही है ख़िज़ाँ बग़ीचे से
छोड़ कर दामन-ए-मोअ'त्तर को
याद करता है रात भर अंबर
तीर खाए परिंद के पर को
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कब तलक बैठा रहेगा ये जहाँ दर पर मिरे
और कितने दिन रहेगा आसमाँ सर पर मिरे
और कितने दिन रहेगा आसमाँ सर पर मिरे
मो'जिज़ा क़िस्मत का है या है ये हाथों का हुनर
आ गिरा मेरा जिगर ही आज नश्तर पर मिरे
छटपटाता है बेचारा रेग-ज़ारों से घिरा
कोई तो दस्त-ए-करम होता समुंदर पर मिरे
जो जहाँ पर है वहीं पर घुल रहा है दिन-ब-दिन
छा गई है बे-हिसी की गर्द मंज़र पर मिरे
गो कि रखता हूँ मैं दुश्मन से हिफ़ाज़त के लिए
नाम तो मेरा मगर लिक्खा है ख़ंजर पर मिरे
ढूँढ़ता फिरता हूँ अपना घर मैं शह्र-ए-ख़्वाब में
रात फिर सोता है कोई और बिस्तर पर मिरे
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पहले गाते थे बजाते थे हवाओं के मिज़ाज
अब तो टूटे हुए सुर-ताल बचा रखे हैं
उड़ गए हुस्न-ओ-जवानी के परिंदे कब के
हाँ तसव्वुर में ख़द-ओ-ख़ाल बचा रखे हैं
बैठा करता था कभी आ के जो ताइर उस के
इक दरीचे ने पर-ओ-बाल बचा रखे हैं
एक नादीदा सनम भी है कहीं तेरे सिवा
उस की ख़ातिर ये मह-ओ-साल बचा रखे हैं
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ख़ुशबू का भी वही है जो है चलन हवा का
उस का बदन हवा का है पैरहन हवा का
उस का बदन हवा का है पैरहन हवा का
कल रात याद-ए-जानाँ या चाँदनी के बाइ'से
बेहद चमक रहा था सीमाब-तन हवा का
सदियों गया वो उस के पीछे हद-ए-जहाँ तक
लेकिन न ढूँड पाया मुल्क-ओ-वतन हवा का
अपने बदन से हट कर महसूस कर सको तो
तुम को दिखाई देगा उर्यां बदन हवा का
मेरे क़रीब आई ख़ुशबू हवा पहन कर
पल्टी तो बन गई थी ख़ुद पैरहन हवा का
तूफ़ाँ के बा'द देखा गुलशन के हर शजर ने
बे-दम पड़ी थी ख़ुशबू ओढ़े कफ़न हवा का
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कोई शिकवा कोई गिला रखिए
कुछ न कुछ जारी सिलसिला रखिए
कुछ न कुछ जारी सिलसिला रखिए
मसअले ज़िंदगी के अपनी जगह
फ़स्ल-ए-गुल का भी कुछ पता रखिए
चंद लम्हे छुपा के लोगों से
ख़ुद को ख़ुद में भी मुब्तला रखिए
सब को अपनाइए मगर ख़ुद से
ख़ुद का थोड़ा सा फ़ासला रखिए
जिस्म दे दीजिए ज़माने को
याद से सिर्फ़ दिल मिला रखिए
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कुल समाअ'त दुखी सदा को दूँ
जिस्म धरती को जाँ हवा को दूँ
जिस्म धरती को जाँ हवा को दूँ
अपनी सारी मताअ'-ए-अक़्ल-ओ-ख़िरद
रूठने की तिरी अदा को दूँ
कुल अनासिर अलग-अलग कर के
कुछ तुझे और कुछ ख़ुदा को दूँ
इक धनक है मिरी निगाहों में
तेरी ज़ुल्फ़ों को या घटा को दूँ
देखूँ कितना लहू टपकता है
अब के ख़ंजर कफ़-ए-वफ़ा को दूँ
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जहाँ ज़मीं से जुड़ा आसमान दिखता है
उसी जगह मुझे अपना मकान दिखता है
उसी जगह मुझे अपना मकान दिखता है
पनाह-ए-दश्त में आया दबीज़ शहर से मैं
यहाँ भी जाल शिकारी मचान दिखता है
सफ़र में आया मिरे एक शहर ऐसा भी
जहाँ पे दूर से अम्न-ओ-अमान दिखता है
नज़र हमारी अगर हो ज़रा फ़क़ीराना
बहुत सलीस ये सारा जहान दिखता है
सँभल के देख कि ऐ पीर मेरी हस्ती में
तुझे कहीं भी ख़ुदा का निशान दिखता है
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कुछ नज़ारे हैं कुछ नज़र बाक़ी
और कुछ कोस का सफ़र बाक़ी
और कुछ कोस का सफ़र बाक़ी
रह गया है किताब में दिन की
शाम का बाब-ए-मुख़्तसर बाक़ी
इस ख़िज़ाँ में भी कुछ महकता है
दिल है बाक़ी अभी जिगर बाक़ी
ख़ाक ही ख़ाक हूँ मगर छू मत इश्क़ का है अभी शरर बाक़ी
वक़्त-ए-रुख़्सत पलट के बरसी जो
है निगाहों में वो नज़र बाक़ी
धुल गई थी जो तेरे अश्कों से
ख़त में वो ही है इक सतर बाक़ी
कसमसाते हैं पाँव के छाले
है अभी भी कोई सफ़र बाक़ी
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