ख़ुशबू का भी वही है जो है चलन हवा का

उस का बदन हवा का है पैरहन हवा का

कल रात याद-ए-जानाँ या चाँदनी के बाइ'से
बेहद चमक रहा था सीमाब-तन हवा का

सदियों गया वो उस के पीछे हद-ए-जहाँ तक
लेकिन न ढूँड पाया मुल्क-ओ-वतन हवा का

अपने बदन से हट कर महसूस कर सको तो
तुम को दिखाई देगा उर्यां बदन हवा का

मेरे क़रीब आई ख़ुशबू हवा पहन कर
पल्टी तो बन गई थी ख़ुद पैरहन हवा का

तूफ़ाँ के बा'द देखा गुलशन के हर शजर ने
बे-दम पड़ी थी ख़ुशबू ओढ़े कफ़न हवा का

— Om Prabhakar

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Kamar Shayari

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