ख़ुद-कुशी का सिरहाना लगा कर
नसीर और ज़ीरक की नज़्में
किसी राएगानी के ज़ेर-ए-असर पढ़ रहा है
लिपटती झपटती शरारत से भरपूर लहरों का पाँव भिगोना
किसी बद-शुगूनी की जानिब इशारा नहीं
मुझ में ऐसा समुंदर है जिस का किनारा नहीं
रौशनी
को छूती हुई रौशनी राएगानी
मेरे पैरों की मिट्टी को माथे का झूमर बना
और उस को बता
साहिलों पर बहुत गंदगी है
Read Fullनसीर और ज़ीरक की नज़्में
किसी राएगानी के ज़ेर-ए-असर पढ़ रहा है
लिपटती झपटती शरारत से भरपूर लहरों का पाँव भिगोना
किसी बद-शुगूनी की जानिब इशारा नहीं
मुझ में ऐसा समुंदर है जिस का किनारा नहीं
रौशनी
को छूती हुई रौशनी राएगानी
मेरे पैरों की मिट्टी को माथे का झूमर बना
और उस को बता
साहिलों पर बहुत गंदगी है
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मैं ने जो भी किया
अपने अंदर का वहशी जगा कर तिरे सामने सर-ब-ज़ानू किया
या उदासी के जबड़े से छीनी हुई रंज की इस ग़ज़बनाक ख़ुराक से तेरा दोज़ख़ भरा
तेरी तकमील की
अब मुझे भी अज़िय्यत की बाबत में कोई सितारा बदन चाहिए
अपने अंदर के शोर-ओ-शग़ब से निकल कर मिरी बात सुन
शाख़-ए-उम्मीद पर कोई काँटा खिला
मुझ को वापस बुला
Read Fullअपने अंदर का वहशी जगा कर तिरे सामने सर-ब-ज़ानू किया
या उदासी के जबड़े से छीनी हुई रंज की इस ग़ज़बनाक ख़ुराक से तेरा दोज़ख़ भरा
तेरी तकमील की
अब मुझे भी अज़िय्यत की बाबत में कोई सितारा बदन चाहिए
अपने अंदर के शोर-ओ-शग़ब से निकल कर मिरी बात सुन
शाख़-ए-उम्मीद पर कोई काँटा खिला
मुझ को वापस बुला
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मुझे कोई ज़ख़्मों के टाँके लगाना सिखा दे
तो मैं अपना चमड़ा उसे दान कर दूँगा
फिर चाहे वो उस के जूते बनाए
या अपनी बलाओं का सदक़ा उतारे
अगर देवताओं में झगड़ा हुआ और तुम इस ज़मीं पर
किसी अन-सुने क़हक़हे के शिकम से बरामद हुए
तो मैं अपनी पोरों पे उगती हुई रात से तुम में इतनी उदासी भरूँगा
कि तुम चीख़ते चीख़ते एक दम हस्त होने लगोगे
लिपट जाओगे मुझ में पैवस्त होने लगोगे
मगर मैं अभी तेरहवाँ ख़्वाब आँखों में पैवस्त करने लगा हूँ
Read Fullतो मैं अपना चमड़ा उसे दान कर दूँगा
फिर चाहे वो उस के जूते बनाए
या अपनी बलाओं का सदक़ा उतारे
अगर देवताओं में झगड़ा हुआ और तुम इस ज़मीं पर
किसी अन-सुने क़हक़हे के शिकम से बरामद हुए
तो मैं अपनी पोरों पे उगती हुई रात से तुम में इतनी उदासी भरूँगा
कि तुम चीख़ते चीख़ते एक दम हस्त होने लगोगे
लिपट जाओगे मुझ में पैवस्त होने लगोगे
मगर मैं अभी तेरहवाँ ख़्वाब आँखों में पैवस्त करने लगा हूँ
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आँखों में चंद ख़्वाब-नुमा तीर गड़ गए
बहते लहू के डर से पपोटे सिकुड़ गए
बहते लहू के डर से पपोटे सिकुड़ गए
मैं आग के क़रीब से गुज़रा न था कभी
ठंडक की नर्म धूप से धागे उधड़ गए
कुछ बेड़ियों ने ख़स्ता किया जिस्म-ओ-जान को
मंज़र तक आते आते मिरे पाँव झड़ गए
कैसी दलीलें कैसी मुनाजात कुछ नहीं
तुझ से बिछड़ना था जिन्हें ख़ुद से बिछड़ गए
माँगी न थी दुआ कभी मैं ने फिर एक शब
उठने की देर थी कि मिरे हाथ झड़ गए
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रात झटके से मिरी नींद खुली टूट गई
काँच की चीज़ थी टेबल से गिरी टूट गई
काँच की चीज़ थी टेबल से गिरी टूट गई
शो'बदा-बाज़ ने ग़ाएब किया मंज़र से मुझे
बे-घरी छूट गई और छड़ी टूट गई
ख़ामुशी नाम की इक शय है मिरे सीने में
तू मुझे हाथ लगा देख अभी टूट गई
क़हक़हा दाइमी था मेरा मिरे पास रहा
मातमी चुप जो मिरी नाम की थी टूट गई
साँस दीवार है जीवन की बहुत ख़स्ता मिज़ाज
दो मिनट टेक लगे और भली टूट गई
तुम से इस वास्ते मानूस नहीं होता मैं
जो कोई चीज़ मुझे अच्छी लगी टूट गई
ज़िंदगी तोहफ़ा मिली जिस को नहीं सर्फ़ किया
बंद डब्बे में नई चीज़ पड़ी टूट गई
इक ज़रा रंज नहीं अपनी हलाकत का मुझे
दुख तो ये है तिरी ख़ामोश रवी टूट गई
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ख़ामोशी की रम्ज़ सुझा
बोल रहा है बोलता जा
बोल रहा है बोलता जा
टेक लगा हम ऐसों से
दीवारों का मान बढ़ा
ख़ाक हुए दरबारों की
यकताई का गीत सुना
चीख़ सुनी दरवाज़ों की
जैसे कहते हों मत जा
हब्स की ख़ातिर कमरे में
ज़िंदानी का इस्म पढ़ा
हाथ कटे इस बस्ती में
कुर्ता लीर-ओ-लीर हुआ
रोना है तो खुल कर रो
रोने वाली शक्ल बना
इश्क़ हुआ बीमारी से
आसेबों का रिज़्क़ खुला
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सख़्त वहशी हूँ बिला-वज्ह बिफर जाता हूँ
इस लिए अपनी तरफ़ जाऊँ तो डर जाता हूँ
इस लिए अपनी तरफ़ जाऊँ तो डर जाता हूँ
एक ही तर्ज़ की वहशत से भरे रहते हैं
मैं अगर दश्त नहीं जाता तो घर जाता हूँ
चार छे इंच की दूरी से मिरा साया मुझे
इक सदा देता है मैं बार-ए-दिगर जाता हूँ
बाज़ औक़ात उदासी को मनाने के लिए
अपने होने की दलीलों से मुकर जाता हूँ
लफ़्ज़ बुनते हुए आता हूँ सड़क पर और फिर
जाने क्या ध्यान में आता है ठहर जाता हूँ
घर से दफ़्तर गया दफ़्तर से घर आया अब दश्त
वैसे बनता तो नहीं जाना मगर जाता हूँ
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डरा रही थी मुझे और डर लिया मैं ने
फिर एक रोज़ मोहब्बत का सर लिया मैं ने
फिर एक रोज़ मोहब्बत का सर लिया मैं ने
किसी से माँगी मुसलसल रसद अज़िय्यत की
फिर अपने साए को दीवार कर लिया मैं ने
पहन रहे थे किसी ग़म का पैरहन कुछ लोग
अगरचे महँगा पड़ा मुझ को पर लिया मैं ने
बग़ैर उदासी मुनासिब नहीं था घर जाना
ये इंतिज़ाम उसे छू के कर लिया मैं ने
तमाम हो गई मुझ पर किसी की हुज्जत दोस्त
जहाँ नहीं था बिफरना बिफर लिया मैं ने
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ठीक है इन दिनों ख़ुद पर ज़रा ग़ुस्सा हूँ मैं
फिर भी अपनी सभी हरकात को तकता हूँ मैं
फिर भी अपनी सभी हरकात को तकता हूँ मैं
आँख की मेज़ पे रक्खा है मिरा ख़्वाब-ए-सफ़र
और बिस्तर पे शिकन डाल के सोया हूँ मैं
मस्लहत ढूँडते फिरते हो सभी कामों में
तुम को बीमार नहीं लगता तो अच्छा हूँ मैं
वक़्त-ए-वहशत मुझे पहचान नहीं पाता कोई
फिर बताता हूँ फुलाँ शख़्स का बेटा हूँ मैं
तुम जो चाहो तो मुझे पेड़ का हिस्सा कर दो
वर्ना पैरों तले रौंदा हुआ पत्ता हूँ मैं
चंद लम्हों का धुआँ अक्स में तब्दील हुआ
और मैं झूम के कहने लगा देखा हूँ मैं
सख़्त बीमारी में रखता हूँ ख़याल आप अपना
ख़ुद से ख़ुद पूछता रहता हूँ कि कैसा हूँ मैं
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पाँव का ध्यान तो है राह का डर कोई नहीं
मुझ को लगता है मिरा ज़ाद-ए-सफ़र कोई नहीं
मुझ को लगता है मिरा ज़ाद-ए-सफ़र कोई नहीं
बाज़ औक़ात तो मैं ख़ुद पे बहुत चीख़ता हूँ
चीख़ता हूँ कि उधर जाओ जिधर कोई नहीं
सर पे दीवार का साया भी उदासी है मुझे
ज़ाहिरन ऐसी उदासी का असर कोई नहीं
आख़िरी बार मुझे खींच के सीने से लगा
और फिर देख मुझे मौत का डर कोई नहीं
ख़ुद-कुशी करते समय पूछता हूँ मेरा अज़ीज़
और आवाज़ सी आती है तो मिरा कोई नहीं
भरी दुनिया है सिसकने में झिजक होगी तुम्हें
ये मिरा दिल है इधर रो लो इधर कोई नहीं
एक दिन लोग मुझे तख़्त-नशीं देखेंगे
या ये देखेंगे मिरा जिस्म है सर कोई नहीं
उस की हिजरत बड़ा आ'साब-शिकन सानेहा थी
शहर तो शहर है जंगल में शजर कोई नहीं
सुब्ह से रात की मायूसी भगाने का सबब
कोई तो होता मिरे दोस्त मगर कोई नहीं
बे-ख़याली सी मुझे गोद में भर लेती है
दर पे दस्तक हो तो कह देता हूँ घर कोई नहीं
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