बारहवीँ मर्तबा
मौत का ख़्वाब तकमील तक आते आते कहीं रह गया है
मुझे कोई ज़ख़्मों के टाँके लगाना सिखा दे
तो मैं अपना चमड़ा उसे दान कर दूँगा
फिर चाहे वो उस के जूते बनाए
या अपनी बलाओं का सदक़ा उतारे
अगर देवताओं में झगड़ा हुआ और तुम इस ज़मीं पर
किसी अन-सुने क़हक़हे के शिकम से बरामद हुए
तो मैं अपनी पोरों पे उगती हुई रात से तुम में इतनी उदासी भरूँगा
कि तुम चीख़ते चीख़ते एक दम हस्त होने लगोगे
लिपट जाओगे मुझ में पैवस्त होने लगोगे
मगर मैं अभी तेरहवाँ ख़्वाब आँखों में पैवस्त करने लगा हूँ
— Osama Khalid















