समुंदर की लहरों में

लटके लिबादे सा लाग़र बदन ये हैंगर पे
ख़ुद-कुशी का सिरहाना लगा कर
नसीर और ज़ीरक की नज़्में
किसी राएगानी के ज़ेर-ए-असर पढ़ रहा है
लिपटती झपटती शरारत से भरपूर लहरों का पाँव भिगोना
किसी बद-शुगूनी की जानिब इशारा नहीं
मुझ में ऐसा समुंदर है जिस का किनारा नहीं
रौशनी
को छूती हुई रौशनी राएगानी
मेरे पैरों की मिट्टी को माथे का झूमर बना
और उस को बता
साहिलों पर बहुत गंदगी है

— Osama Khalid

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