तेरी यादें दफ़्न कर देती हैं उस के ज़ोर को
रोज़ उठता तो है दिल में जा-ब-जा तूफ़ान सा
रौनक़-ए-शहर-ए-रिया ताख़ीर होनी थी हुई
रास्ते में पड़ गया था इक खंडर वीरान सा
आप आएँगे तो वहशत साथ ले कर आएँगे
रास्ता आता है मेरे घर पे इक सुनसान सा
पूछने आता नहीं कोई मिरे हालात अब
मैं वतन में हो गया हूँ अपने ही अंजान सा
जब सफ़र तय कर लिया तब इस का अंदाज़ा हुआ
देखने को रास्ता तो था बहुत आसान सा
कोई पूछे राहबर से रख़्त-ए-जाँ रख़्त-ए-सफ़र
क़ाफ़िला जाता कहाँ है बे-सर-ओ-सामान सा
काग़ज़ी फूलों पे तितली कोई आई नहीं
मेज़ पर रक्खा हुआ था यूँ तो इक गुल-दान सा
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ऐसा महसूस हुआ तू नहीं राज़ी मुझ से
बे-यक़ीनी का मुझे तुझ पे गुमाँ ख़ूब हुआ
ख़ुश्बू-ए-इश्क़ उड़ी ले के परों पर तितली
जिस को चाहा था छुपाना वो अयाँ ख़ूब हुआ
कोई जलता हुआ मंज़र तो नहीं था लेकिन
हाँ मगर रात सुना है कि धुआँ ख़ूब हुआ
एक सूरज ने मिरे जिस्म पे किरनें रख दीं
आज रौशन मिरा तारीक मकाँ ख़ूब हुआ
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चराग़ जब से मिरे तीरगी से हार गए
हवा से हाथ मिलाने को सारे यार गए
हवा से हाथ मिलाने को सारे यार गए
हर एक बार सफ़र मेरा मुख़्तसर क्यूँ था
सफ़ीने मुझ को ही साहिल पे क्यूँ उतार गए
तिरी सराए में सामाँ कहाँ सुकून का था
किसी तरह से मुसाफ़िर भी शब गुज़ार गए
मैं जिन को साए में रखता था तपते सहरा में
ग़ज़ब है लोग वही मुझ पे संग मार गए
हुई जो शाम तो लौटे वतन में अपने ही
परिंदे यूँ तो बहुत सरहदों के पार गए
बुरीदा-सर ही नहीं थे लहू में डूबे हुए
सुना है नेज़े अदू के भी अश्क-बार गए
बदन पे सब के क़बाएँ थीं सुर्ख़ आँखों की
अजब तरह से ख़िज़ाओं में गुल-ए-एज़ार गए
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मैं रस्ते में जहाँ ठहरा हुआ था
वहीं तो धूप का चेहरा खिला था
वहीं तो धूप का चेहरा खिला था
सभी अल्फ़ाज़ थे मेरी ज़बाँ के
मगर मैं ने कहाँ कुछ भी कहा था
वो किस के जिस्म की ख़ुश्बू थी आख़िर
हवा से तज़्किरा किस का सुना था
समुंदर में बहुत हलचल थी इक दिन
सफ़ीना किस का डूबा जा रहा था
कि जैसे ख़्वाब सा देखा था कोई
बस इतना याद है कोई मिला था
खंडर में घूमती फिरती थीं यादें
उदासी का अजब मंज़र सजा था
मिरी मिट्टी की हिम्मत बढ़ गई थी
मिरे रस्ते में दरिया आ गया था
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किसी के दीदा-ए-तर को नज़र में रखते हैं
सफ़र में ख़ुद को मगर दिल को घर में रखते हैं
सफ़र में ख़ुद को मगर दिल को घर में रखते हैं
पलटना पड़ता है हर शाम उन परिंदों को
न जाने कौन सी शय को शजर में रखते हैं
खुली फ़ज़ाओं की वुसअ'त वो कैसे समझेंगे
जो क़ैद ख़्वाब को दीवार-ओ-दर में रखते हैं
पुकारते हैं उन्हें उन के घर के सन्नाटे
वो अपने-आप को क्यूँ रहगुज़र में रखते हैं
ख़ुलूस रखते हैं लेकिन झुका नहीं करते
अना का रंग भी थोड़ा हुनर में रखते हैं
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जो तेज़-रौ थे थी पैरों में जिन के जान बहुत
वो लोग ओढ़ के सोए हैं अब थकान बहुत
वो लोग ओढ़ के सोए हैं अब थकान बहुत
दरों में क़ैद कहीं इख़्तिलाफ़ होते हैं
मकीन हो के भी रहते हैं बे-मकान बहुत
न जाने शोर उठा कर कहाँ से लाई है
हवा ने आज दिखाए हैं मेरे कान बहुत
ये ज़िंदगी भी अजब राह की मुसाफ़िर है
कहीं चढ़ान बहुत है कहीं ढलान बहुत
ये राज़ रोज़ कोई फ़ाश कर ही देता है
ज़मीन ख़ुद में समेटे है आसमान बहुत
ज़मीं उठेगी नहीं आसमाँ झुकेगा नहीं
अना-परस्त हैं दोनों के ख़ानदान बहुत
किसी का दर्द सुनूँगा तो टूट जाऊँगा
मिरे लिए है फ़क़त मेरी दास्तान बहुत
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आँखें मिला रहे हैं वही आसमान से
वाक़िफ़ नहीं हैं लोग जो अपने जहान से
वाक़िफ़ नहीं हैं लोग जो अपने जहान से
क्या जाने कैसी जंग है तिश्ना-लबी के साथ
ख़ंजर ही हाथ धोने लगे अपनी जान से
इक दूसरे के ख़ून की प्यासी है काएनात
रहता नहीं है कोई कहीं भी अमान से
ताज-ए-शही पे ख़ाक उड़ाता रहा फ़क़ीर
मिट्टी ने उम्र काट ही ली अपनी शान से
अब सूरजों से हाथ मिलाने का वक़्त है
उक्ता गए हैं लोग बहुत साएबान से
मुद्दत से रो रही है समुंदर की मौज मौज
क्या कह गया था कोई लरज़ती ज़बान से
हम ने तमाम-उम्र गुज़ारी है उस के साथ
वहशत सी हो रही है हमें जिस मकान से
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क्या जाने किस ख़याल में किस रास्ते में हूँ
शायद मैं तेरे बा'द किसी मसअले में हूँ
शायद मैं तेरे बा'द किसी मसअले में हूँ
वो भी घिरा हुआ है ज़माने की भीड़ में
मैं भी इसी जहाँ से अभी राब्ते में हूँ
तू मुस्कुरा के आज मुझे कर रहा है याद
या'नी मैं तेरे साथ तिरे आइने में हूँ
सहरा में तेज़ धूप का एहसास ही नहीं
बाक़ी है एक पेड़ अभी आसरे में हूँ
कैसे किसी फ़ुरात से हो दोस्ती मिरी
मैं तिश्ना-लब हुसैन तिरे क़ाफ़िले में हूँ
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मौजों की साज़िशों ने किनारा नहीं दिया
तिनके ने डूबते को सहारा नहीं दिया
तिनके ने डूबते को सहारा नहीं दिया
उस ने भी मेरा हाल न पूछा किसी भी वक़्त
मैं ने भी उस को कोई इशारा नहीं दिया
उस रात को सियाह बताने में क्या गुरेज़
पलकों पे जिस ने कोई सितारा नहीं दिया
तारीख़ लिख रही थी नए सर की दास्तान
लेकिन सिनाँ ने नाम हमारा नहीं दिया
मुद्दत से ऐसे ख़्वाब में उलझे हुए हैं लोग
जिस ने हक़ीक़तों में नज़ारा नहीं दिया
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तुझे तेरा समुंदर हो मुबारक
हमारी प्यास से अच्छा नहीं है
वही बारिश का चर्चा कर रहे हैं
बदन जिन का कभी भीगा नहीं है
कभी देखा नहीं है हम ने वर्ना
ज़मीं की वुसअ'तों में क्या नहीं है
अभी से आ गई है रात मिलने
अभी तो चाँद भी निकला नहीं है
निगाहें तक रही हैं घोंसले की
परिंदा लौट कर आया नहीं है
मैं रुकने के लिए आया था घर में
किसी ने क्यूँ मुझे रोका नहीं है
कहाँ असरार अपने पा सकेगा
अभी ख़ुद में कोई भटका नहीं है
सभी किरदार अच्छे लग रहें हैं
कहानी में कोई सच्चा नहीं है
मह-ए-कनआँ' है अहद-ए-ना-रसाई
अभी बाज़ार तक पहुँचा नहीं है
ज़मीं पर ज़ोर है जादूगरों का
असा-ए-हज़रत-ए-मूसा नहीं है
समुंदर तो मथे जाती है दुनिया
कोई भी विश मगर पीता नहीं है
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