मिरे हाथ में उस का पैग़ाम था
पर उस
में किसी और का नाम था
वो मेरे लिए जिस क़दर ख़ास थी
मैं उस के लिए उतना ही आम था
तवज्जोह से मारे हुए शख़्स पर
तवज्जोह न देने का इल्ज़ाम था
उसे आख़िरी सफ़ में मैं ने लिखा
मिरी दास्ताँ का वो अंजाम था
भुला देता तुझ को, मगर मुझ पे तो
वफ़ादार होने का इल्ज़ाम था
मुझे झूठ कहने की आदत नहीं
मगर झूठ कहने पे ईनाम था
जो दौरान-ए-तर्क़-ए-त'अल्लुक रही
ख़मोशी नहीं थी, वो कोहराम था
— Yamir Ahsan















