"तो लिखता हूँ"
बाहर आना चाहे पीड़ पुरानी जब
ज़िंदा होतीं तस्वीरों की सुन लूँ जब
इक एहसान के नीचे कुचले जाऊँ जब
तो लिखता हूँ
सीधे बोल न पाऊँ उलझी बातें जब
पैने दाँतों को चपटा करना हो जब
काटे से न कटे फ़ुर्क़त की रातें जब
तो लिखता हूँ
गहरी शब में सोते हों जब यार सभी
यादें भड़का दें ख़्वाबीदा प्रीत कभी
धड़कन ज़ेर-ए-लब गाती हैं गीत कभी
तो लिखता हूँ
राह दिखाता तारा छिपता जाए जब
पंछी-पेड़ भी कुछ बतलाते जाऍं जब
साया बिसरा सा गर्दिश कर जाए जब
तो लिखता हूँ
रंग-ए-दिल में सुर्ख़ी फिर से लानी हो
गिरवी दिल का कोई हिस्सा करना हो
चस्पाँ दिल में कोई क़िस्सा करना हो
तो लिखता हूँ
ख़ुश-चेहरा मुस्काते जाए मन में जब
कुछ अरमान जगाए ताज़ा बातें जब
बेघर सी फ़िक्र जो लागे इस दिल में जब
तो लिखता हूँ
अपने से कब कुछ लिखता हूँ जो है सो
इन बातों का ज़ोर है रह-रह कर लिखना
जाने क्या ही मिलता है लिख कर शायद
समझाता हूँ समझ लेता हूँ ख़ुद को तब















