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सब जिसे माहताब कहते है - Anis shah anis

सब जिसे माहताब कहते है
तेरे रुख़ का शबाब कहते है

बर्ग-ए-गुल सी है नाज़ुकी उनकी
हम लबों को गुलाब कहते है

लोग आँखों से पी बहकते है
चश्म जामे-शराब कहते है

गेसुओं से टपकती बूंदों को
अब्र से गिरता आब कहते है

तेरी पाज़ेब की हुई रुनझुन
बज रहा ज्यों रबाब कहते है

दूर होकर भी पास लगती हो
क्या इसी को सराब कहते है

पढ़ सकोगे 'अनीस' चेहरे को
लोग इसको किताब कहते हैं

- Anis shah anis

Chaand Shayari

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