ek bhatki kashtii ko phir se kinaara mil gaya | एक भटकी कश्ती को फिर से किनारा मिल गया

  - Arohi Tripathi

एक भटकी कश्ती को फिर से किनारा मिल गया
मैं अकेली थी जहाँ में वो सहारा मिल गया

अब समझ आया मुझे जिस बात से अनजान थी
रो रही थी सोचकर कैसा नकारा मिल गया

तुम मोहब्बत थे मगर तुझ
में कहाँ वो बात थी
उसकी मैं होने लगी अच्छा दुलारा मिल गया

वो हमारी बात सुनकर चुप रहा ख़ामोश था
चाँद थी उसके लिए मुझको सितारा मिल गया

एक दिन जब साथ बैठे बात शायर ने कही
जो तुम्हारा था मिला जो था हमारा मिल गया

  - Arohi Tripathi

Shaayar Shayari

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