किसे मालूम कितने ग़म छिपाता है
वो चेहरा जो हमेशा मुस्कुराता है
मैं भी कुछ सोच कर रखता हूँ नज़दीकी
वो भी कुछ सोच कर के दूर जाता है
ख़ुशी की बात सुन कर के हुआ है दुख
बिछड़ कर भी वो सब वादे निभाता है
पसीना ख़ूँ लगाकर भी पराया ही
कोई मज़दूर कितने घर बनाता है
लगाता आग ख़ुद है वो सियासत में
सियासत में ही फिर उस को बुझाता है
— Avinash bharti















