हम ख़ूब जानते हैं फिर वो ही ग़म मिलेंगे
जिस राह जा रहे हैं काफ़िर–सनम मिलेंगे
तुम जान लो ये जानाँ कुछ भी कहे ज़माना
जो हम सेे कम मिले हैं हम उन सेे कम मिलेंगे
जब ज़िंदगी से हमको कुछ भी नहीं मिला है
सो ज़िंदगी को कैसे फिर यार हम मिलेंगे
कमरे में तुमको मेरे कुछ और क्या मिलेगा
सिगरेट जली मिलेगी काग़ज़ क़लम मिलेंगे
कब शाम ज़िंदगी की फिर उस तरह कटेगी
कब खेलने को फिर उन ज़ुल्फ़ों के ख़म मिलेंगे
इस राह-ए-इश्क़ में तो कुछ भी नहीं बदलता
ज़ुल्म–ओ–सितम मिले थे ज़ुल्म–ओ–सितम मिलेंगे
वो दूर जा चुके हैं इतने ‘अभी’ कि उनको
जब तक ख़बर मिलेगी हम मुख़्ततम मिलेंगे
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