रहा हूँ ज़िंदगी भर एक धोखे में
मिलेगा कोई तो महबूब सजदे में
मेरी आँखों में ख़ुद को देखो फिर सोचो
हसीं कोई है तुम सेा इस ज़माने में
मेरे झोले में हैं दुख ग़म उदासी सब
बताओ क्या दिखाऊँ मैं तमाशे में
बयाँ कर ही नहीं सकता ख़ुशी अपनी
परी जो निकली है मेरे ख़ज़ाने में
किसी दिल से उतरता जा रहा हूँ मैं
किसी के हुस्न के नंबर बढ़ाने में
ख़बर क्या होनी है तुम को ख़सारे की
मेरा क्या क्या लगा तुम को बनाने में
— Daksh Sharma















