सुनाई देती है हर शब सदा कोई
मिरे अंदर हो जैसे चीख़ता कोई
उदासी ज़ब्त कर लेती है पूरा दिल
असर करता नहीं फिर क़हक़हा कोई
बदल ही जाता है मौसम मुहब्बत का
ले ही आती है पतझड़ फिर हवा कोई
कोई भी ख़्वाब आँखों में नहीं आता
लगी हो जैसे मुझ को बद-दुआ कोई
अलग क्या होगा मुझ
में और औरों में
मैं भी लूंँ गर बदन से रास्ता कोई
— Daksh Sharma















