रौशनी से डरा हुआ है तू
फिर भी हम लोगों का ख़ुदा है तू
शहर है ये पुराने लोगों का
शहर में एकदम नया है तू
मैं सफ़र में हूँ कितने सालों से
और हर मोड़ पर मिला है तू
क्या कहा वो गले लगाएगा
रेत पर घर बना रहा है तू
मुझ पे बिल्कुल तरस नहीं आता
कौन सी मिट्टी का बना है तू
— Daksh Sharma















