क़ैस ने माना कि सहरा देखा है
आग का हम ने भी दरिया देखा है
आमद-ओ-शुद, सा'अत-ए- हिज्र-ओ-विसाल
मेरी इन आँखों ने क्या क्या देखा है
दुख किसी का कोई कैसे समझे जब
सब ने बस अपना ही अपना देखा है
यूँ नहीं होता किसी का कोई भी
ख़ुद को जैसे तेरा होता देखा है
मैं ने अपने दिल को सीने में नहीं
ग़ैर के पहलू में धड़का देखा है
रंज, धोखे सब मिले तेरे सबब
मैं ने हरदम ख़ुद को तन्हा देखा है
ज़ब्त का दावा था जिन को इश्क़ में
आज मैं ने उन को रोता देखा है
मुझ से मिलने आए हैं वो मेरे घर
फ़ैज़ मैं ने कैसा सपना देखा है
— Dard Faiz Khan















