प्यार करते हो जताने की ज़रूरत क्या है

हम पे मरते हो दिखाने की ज़रूरत क्या है

हम तो आँखों से नशा कर ही चुके हैं पहले
जाम हाथों से पिलाने की ज़रूरत क्या है

सामने वाले ही घर से तो उठेगी डोली
घर हमारा भी सजाने की ज़रूरत क्या है

हम अकेले तो रहेंगे ही नहीं उस घर में
तो भला हम को ठिकाने की ज़रूरत क्या है

हम को मालूम ये मज़दूरी न होगी तुम से
तो तुम्हें यार कमाने की ज़रूरत क्या है

— Gulshan Panwar

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