चाँद के दीदार को महरू लड़े
तुम निकल जो आओ हर जुगनू लड़े
वो जिसे सारा जहाँ अपना लगा
वो सिकंदर जंग में हर सू लड़े
मैं उलट देता था चप्पल भी कभी
इस तरह से ही सही पर तू लड़े
उठ चुकी है और इक दीवार याँ
फिर किसी माँ बाप के बाज़ू लड़े
बाग़ से गुज़रे कभी जो दिल-नशीं
देख कर लब फूल क्या ख़ुशबू लड़े
इक ख़ुदा के वास्ते सब कुछ जला
कुछ मुसलमाँ और कुछ हिंदू लड़े
— Happy Srivastava 'Ambar'















