मुद्दत से हम इक वहम पाला करते थे
हम को लगा था सब हमी पे मरते थे
हम शे'र लिखते रहते थे इक हुस्न पर
उन को लगा था सिर्फ़ पन्ने भरते थे
तौसीफ़ उस की इतनी करते थे कि हम
ता'रीफ़ ख़ुद की भूलने से डरते थे
वो ज़ीनत-ए-महफ़िल चुरा ले जाती थी
हम तालियाँ ही बस समेटा करते थे
— Hemant Sakunde















