अजीब सा कोई मौसम किफ़ायती ही रहा

तमाम शहर में तूफ़ान दो-घड़ी ही रहा

यूँ तो ज़बान की ख़ुशबू से रू-ब-रू भी हुए
मगर नज़र से वो महताब अजनबी ही रहा

तमाम रात वो तो बारहा बरस रही थी
ये सब के बा'द भी ख़ामोश आदमी ही रहा

किसी को टूटे हुए ख़्वाब ही नसीब हुए
किसी की आँखों का हर ख़्वाब क़ीमती ही रहा

वो एक चीख़ से दीवारें गूँगी क्या हुई थी
सराए में छुपा हर राज़ आपसी ही रहा

— Ajay Kumar

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