आदमी उम्र को घटाता है

चेहरा है सिलवटें दिखाता है

मुझ को मेरे ख़राब होने का
बे-सबब ही ख़याल आता है

कोई रिश्ता हो तो निभाऊँ मैं
कौन ही हादसा निभाता है

ख़ुद-कुशी ने किवाड़ खोले हैं
और वो रस्सियाँ बनाता है

एक ही रंग पे निगाहें हैं
एक ही रंग मुझ को भाता है

आप को देखना मुनासिब है
आप का मुझ से एक नाता है

अच्छे लोगों से बात होती थी
अब मुझे कौन ही बुलाता है

मैं मुकम्मल उदास रहता हूँ
एक दुख ऐसे मुझ को खाता है

— Ajay Kumar

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