हर मुसाफ़िर पे उस का चेहरा है
आप का वहम भी ग़ज़ब का है
रेगज़ारों में दूर का आलम
हम को अक्सर क़रीब लगता है
हम तबीअत से डूब जाएँगे
मय-कदे का निज़ाम गहरा है
आप के तो अज़ीज़ होते थे
आपने अजनबी बताया है?
एक सूखी हुई नदी का दुख
एक वीरान सा किनारा है
तब ख़ुशी सामने से आती थी
अब कोई सामने भी आता है?
— Ajay Kumar















