ग़ैर के ग़म में हम ने रोना सीखा है

दुश्मन के घावों को धोना सीखा है

साहिर और निदास सीखा साफ ज़बान
जौन को सुनके पागल होना सीखा है

पहले तो कुछ भी खोए रो देता था
बा'द तुम्हारे हँस के खोना सीखा है

फिर से ख़ुशियों की लालच क्यूँ देते हो
ढोते ढोते तो ग़म ढोना सीखा है

मुझ को आख़िर क्यूँ हँसने को कहते हो
अरसे बा'द तो मैं ने रोना सीखा है

दफ़्न हूँ मैं आवाज़ लगाओ मत मुझ को
मुश्किल से तो चैन से सोना सीखा है

— Pushpendra Mishra

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