KARAN
KARAN
Ghazal

दुनिया ने बेकार समझकर फेंक दिया

तुम ने भी तो ख़ैर ये गौहर फेंक दिया

मुश्किल से तो ज़ब्त की आदत डाली थी
उस ने फिर पानी में कंकर फेंक दिया

मतलब तो था यार नशे से सो हम ने
उस की आँखें देखी सागर फेंक दिया

टूटा तो मैं एक से एक हज़ार हुआ
ख़ूब ये तुम ने मुझ पर पत्थर फेंक दिया

उस के हाथ में गुल-दस्ता था क्या करते
हम ने अपने हाथ का ख़ंजर फेंक दिया

फिर मेरी तफ़्सील कहाँ तक मुमकिन थी
जिस ने मुझ को खोला पढ़कर फेंक दिया

हाए मेरी प्यास की शिद्दत से जल कर
उस ने मेरी सम्त समुंदर फेंक दिया

उस की आमद ने ये ज़ुल्म किया मुझ पर
तन्हाई के वज्द से बाहर फेंक दिया

काश सितारा होता रौशन रहता मैं
क्यूँ धरती पर बंदा-पर्वर फेंक दिया

हम को उस ने काँटा-छाँटा ख़ूब 'करन'
बस मतलब का रक्खा दीगर फेंक दिया

— KARAN

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