Kunu
Kunu
Ghazal

मिला लो कहीं से जुनूँ यार कामिल

नहीं है यहाँ वो क़लमकार कामिल

क़ज़ा तक गुरेज़ाँ हुआ मर्द मदफ़न
कहाँ लिख रहा ये ज़बाॅं ख़्वार कामिल

मिरे इल्तिजा में दवा से रुबा तक
जला है कटा है कभी प्यार कामिल

न समझा करो सब बयाबाँ तक़ाज़ा
रहा ख़ुश-नुमाई अदा वार कामिल

मिटा हर कलीसा मुसलमाॅं क़लम से
धरा बन सकोगे यहाँ चार कामिल

कुनू भी मुक़र्रर नहीं इस सुख़न तक
ज़ियाँ मुद्दआ' बूद अश'आर कामिल

— Kunu

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