मिला लो कहीं से जुनूँ यार कामिल
नहीं है यहाँ वो क़लमकार कामिल
क़ज़ा तक गुरेज़ाँ हुआ मर्द मदफ़न
कहाँ लिख रहा ये ज़बाॅं ख़्वार कामिल
मिरे इल्तिजा में दवा से रुबा तक
जला है कटा है कभी प्यार कामिल
न समझा करो सब बयाबाँ तक़ाज़ा
रहा ख़ुश-नुमाई अदा वार कामिल
मिटा हर कलीसा मुसलमाॅं क़लम से
धरा बन सकोगे यहाँ चार कामिल
कुनू भी मुक़र्रर नहीं इस सुख़न तक
ज़ियाँ मुद्दआ' बूद अश'आर कामिल
— Kunu















