इक बदन की तलब लग रही है मुझे
और यूँ बे-सबब लग रही है मुझे
ज़िंदगी में नहीं ख़ास कुछ भी मगर
साथ तेरे ग़ज़ब लग रही है मुझे
आस कितनी लगाए हुए बैठे हैं
लड़की पेड़ों सी अब लग रही है मुझे
होंठ उस के दिखे थे मुझे एक दिन
ज़िंदगी तब से लब लग रही है मुझे
बात जो बा-अदब लग रही है तुम्हें
वो बड़ी बे-अदब लग रही है मुझे
उस का कहना है मैं ख़ुद बताऊँ उसे
ये तलब कब की अब लग रही है मुझे
— Amanpreet singh















