ग़ज़ल में यूँँ ही नाम मैं भर गया
तिरा नाम ही सिर्फ़ बन पर गया
यूँ खोजे तू ज़िंदा मुझे सब जगह
मैं तो ज़िंदगी से ही हूँ डर गया
हरा पेड़ बचपन की ही याद है
समय आते ही ये भी झड़ पर गया
क़लम को घड़ी सौंप आराम है
समय पर तिरा नाम लिख कर गया
ये जो ख़्वाब था पानी सा साफ़ था
कि क़िस्मत बुरी पानी सड़ मर गया
— Subhadeep Chattapadhay















