ज़िद लिए मैं रहा बैठा हर दिन
सामने मेरे चौराहा हर दिन
राह पे बैठा आख़िर मैं कब हूँ
आसमाँ पर ही जा बैठा हर दिन
जन्म को मरने को इक मिला दिन
ज़िंदगी में रहा ज़िंदा हर दिन
धर्म अब कट चुका इस जहाँ में
तुम ने ही तो उसे काटा हर दिन
ख़ुद ख़ुदा डर रहा आने को अब
बढ़ रहा बास जो डर का हर दिन
— Subhadeep Chattapadhay















