अंतर है ये रिश्ता रखने और निभाने में
हर कोई नहीं जल सकता दीप जलाने में
निकला था मैं घर से मेरी ज़िंदगी जीने को
ये ज़िंदगी बीती है घर लौट के जाने में
हर रात को उस की फोटो देख के हँसता हूँ
नाराज़ हो जाती थी वो मुझ को मनाने में
तुम ख़ुश रहो मैं तुम पर ये शा'इरी करता हूँ
मेरी जाँ बताने को ग़म भी हैं ज़माने में
तुम को तो विरासत में ये इश्क़ मिला प्रीतम
वर्ना ये जाँ खप जाती हैं इश्क़ कमाने में
— Pritam sihag















