हुकूमत को गिराना था

यही उस का निशाना था

उसे परवाह हो कैसे
उसे तो घर बनाना था

न थे पैसे मगर फिर भी
जो भी था वो खज़ाना था

उसे तो छोड़ जाना था
मोहब्बत भी बहाना था

वो जो गुज़रा बरस दो इक
वो भी कितना सुहाना था

न था कुछ वक़्त ही था बस
वो भी क्या इक ज़माना था

मोहब्बत था मोहब्बत है
उसे तो बस निभाना था

गया जो मर वो इक लड़का
वो लड़का इक दिवाना था

कहो जो भी मगर यारों
वो तो बेहद सियाना था

— Kanz Al Rida

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