तुझ को महलों में मुझे आराम मय-ख़ाने में है
क्या करूँ ऐ दोस्त मेरा जाम मय-ख़ाने में है
ये जो वाइज़ घूमता है शान से इस शहर में
नाम वाला है मगर बदनाम मय-ख़ाने में है
बाँटने वाले ख़ुदा सारे मुबारक हो तुम्हें
मेरा का'बा मेरे चारो धाम मय-ख़ाने में हैं
लड़ने वालों के लिए है जंग का मैदान पर
मैं शराबी हूँ मेरा अंजाम मय-ख़ाने में है
कह चुका है और अब कितना कहे तुम से 'ग़ुलाम'
वो नहीं उस का कोई हमनाम मय-ख़ाने में है
— Ritik Bhatt 'ghulam'















