ज़माने भर से रुस्वा हूँ ज़माने भर से वहशत है
मुझे अब अपना दिखने वाले हर मंज़र से वहशत है
जो मैं कर के मिटी उस का कहाँ ही ज़िक्र होता है
मेरी नाकामियों के लग चुके कोहरस वहशत है
मेरी ख़ामोशियों का ज़र्फ़ है ज़िंदा मुझे रखना
मेरी आँखें कोई पढ़ ले इसी इक डर से वहशत है
मुझे जज़्बों से घेरे ज़िंदगी मुस्का के कहती है
तुझे पंखों से चाहत है मगर अंबर से वहशत है
— Sakshi Saraswat















