मैं जब घर थी तो राहत थी बड़ा महफ़ूज़ कोना था
मैं अब भी हॅंस के चलती हूँ जहाँ जी भर के रोना था
जहाँ भर से शिकायत थी मुझे तेरा भरोसा था
अभी लगने लगा है तुझ को पाना ख़ुद को खोना था
सभी राहों पे चल कर अब मुझे महसूस होता है
जो होना है वो होता है जो होता है वो होना था
— Sakshi Saraswat















