मिले सहरा मुहब्बत से दिल-ए-दरिया मिटाने को
मैं साहिल तक भी आई हूँ तो वापस डूब जाने को
कभी उमड़ी जो ख़्वाहिश सब भुलाकर खुल के जीने की
चले आए सभी बीते दिनों का हाल पाने को
कभी हँस दूँ अगर हैरानी से दिल चौंक उठता है
कि ग़म न्योता न समझे बस मेरे इस मुस्कुराने को
किसी को देखो तुम तन्हा सुलगती धूप में चलते
समझना उस का अपना था उसे इस राह लाने को
— Sakshi Saraswat















