इश्क़ पर इसलिए भी भरोसा नहीं
जो भी जाता है मुड़कर वो आता नहीं
उस को पाने में हमको जो दिन थे लगे
साथ उतने भी दिन पर वो ठहरा नहीं
होनी वहशत ही थी इश्क़ में जो थे हम
रक्खा वहशत से फिर हमने रिश्ता नहीं
मेज़ को देख कर सोच में गुम थे हम
एक भी पाया दूजे से लड़ता नहीं
सर दिवारों में मारें या नस काट लें
अपनी सिसकी कोई सुन ने वाला नहीं
एक अरसे तलक पास रक्खा मुझे
याद वरना मैं उस को यूँँ करता नहीं
फेंक देते, या अल्बम जला देते पर
दिल ये दोनों ही बातों पे माना नहीं
सौ दफ़ा है उसी इक गली से गुज़र
देखता हूँ मैं उस को दिखा या नहीं
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