मय-ए-गुलगूँ से है लबरेज़ पैमाना चले आओ

बहक जाए न ऐसे में ये दीवाना चले आओ

ज़रा सी देर लगती है ज़रा सी बात बढ़ने में
ज़रा सी बात बन जाती है अफ़साना चले आओ

चराग़-ए-दिल जला कर रख दिया है बाम-ए-इमकाँ पर
सुनो ऐ बन्दा-परवर मिस्ल-ए-परवाना चले आओ

मुझे दैर-ओ-हरम के तज़किरे गुमराह करते हैं
सहीफ़ा-हाए-उल्फ़त ले के मयख़ाना चले आओ

कहीं चादर कहीं बिस्तर कहीं प्याला कहीं मय है
उजड़ता जा रहा है मेरा काशाना चले आओ

ख़िलाफ़-ए-बुतपरस्ती पर बुतों से बात करनी है
चलो ऐसा करो कि तुम भी बुतख़ाना चले आओ

अगर शादाब से मिलना है तो नौगढ़ चले जाना
अगर मिलना हो साहिर से तो लुधियाना चले आओ

— Shadab Shabbiri

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