"तराना-ए-वतन"

ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू, अरमानों का चमन
जन्नत से कम नहीं है तू मेरे लिए वतन
इक गीत मैं ने लिक्खा है तेरे लिए वतन
ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू, अरमानों का चमन
परबत हिमाला अज़्म का परचम कहें जिसे
गंग-ओ-जमन हैं प्यार का संगम कहें जिसे
झरनों से फूटी है नई उम्मीद की किरन
ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू,अरमानों का चमन
गौतम रहीम नानक और चिश्ती-ओ-कबीर
पैग़ाम लाए प्यार मोहब्बत का सब फ़क़ीर
इंसानियत का सब को सिखाकर गए चलन
ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू,अरमानों का चमन
बढ़ने ना पाए हिंदू-मुसलमाँ में फ़ासले
सब एक हैं जवाँ हैं अभी अपने हौसले
हाँ! गुलज़मीन-ए-हिंद पे क़ुर्बान है गगन
ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू,अरमानों का चमन
हम एक हैं हम एक हैं गूंजे वही सदा
अपने वतन पे कर देंगे हम जान-ओ-तन फ़िदा
अपने सरों से बांधके निकले हैं हम कफ़न
ख़्वाबों का गुल्सिताँ है तू, अरमानों का चमन

— Rekhta Pataulvi

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