मन अपना मन मानी है
काहे की हैरानी है
काग़ज़ की ये कश्ती है
स्याही का ये पानी है
आँखों में गहराई है
हरकत इक नादानी है
देखी जो बरसों पहले
सूरत ये पहचानी है
प्यार नहीं सस्ता होता
ये तो अमर रूहानी है
बिंदी उस की सुंदर है
पत्थर की पेशानी है
चाँद में जिस को देखा है
चेहरा वो नूरानी है
— Shivangi Shivi















