जब भी आती हिचकियाँ हैं
याद आती चिट्ठियाँ हैं
हम सभी हैं एक जैसे
हम सभी में ख़ामियाँ हैं
ख़्वाब के छत पर से गिर के
टूटी सारी हड्डियाँ हैं
अब हमारे पास केवल
नींद की बस गोलियाँ हैं
आज कल तो हफ़्ते भर में
टूट जाती शादियाँ हैं
ज़िंदगी को जानने में
सब से होती ग़लतियाँ हैं
— Adarsh Akshar















